दर्शन विशुद्धि आदि 16 कारण भावना को चिंतन भाने से तीर्थंकर नाम कर्म की सातिशय पुण्य प्रकृति का बंध होता है। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने श्री चंद्रप्रभ जिनालय बड़ के बालाजी में यह उद्बोधन दिया। जयपुर से पढ़िए, डॉ.राजेश पंचोलिया की यह रिपोर्ट…
जयपुर। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी गणिनी श्री सुपार्श्व मति माताजी की समाधि स्थली श्री चंद्रप्रभ जिनालय बड़ बालाजी में संघ सहित विराजित हैं। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने धर्म सभा में उपदेश दिया कि सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यकचारित्र से संसार सागर से तरते है, इसलिए इन्हें तीर्थ कहते हैं। जो तीर्थ का उपदेश देते हैं, वे तीर्थंकर कहलाते हैं। जो समवसरण में विराजमान होकर धर्म का सच्चा उपदेश देते हैं जिन्हें तीन लोक के जीव नमस्कार करते हैं वह तीर्थंकर होते है। सुरेश सबलावत भागचंद चुड़ीवाल के अनुसार आचार्य श्री ने कहा कि कोई भव्य सम्यग्दृष्टि जीव तीर्थंकर केवली या श्रुत केवली के पादमूल में दर्शन विशद्धि आदि सोलह कारण भावनाओं को भाता है, तब उसे तीर्थंकर नामकर्म की सातिशय पुण्य प्रकृति का बंध होता है, पुनः वह तीर्थंकर नाम कर्म की प्रकृति जब उदय में आती है। तब उस जीव द्वारा धर्म तीर्थ का प्रवर्तन होता है और वह धर्म तीर्थ का प्रवर्तक जीव, तीर्थंकर कहलाता है। तीर्थंकर वैसे तो अनंत हो चुके, किन्तु भरत और ऐरावत क्षेत्र में अवसर्पिणी के चतुर्थ काल एवं उत्सर्पिणी के तृतीय काल में क्रमशः एक के बाद एक चौबीस तीर्थंकर होते हैं। आचार्य श्री ने भरत क्षेत्र के भूतकाल, वर्तमान काल, भविष्य काल के 24 तीर्थंकर भगवान तथा विद्यमान विदेह क्षेत्र के विद्यमान 20 तीर्थंकरों के नाम की विवेचना की। श्री आदिनाथ, वृषभनाथ और ऋषभनाथ के 3 नाम, श्री पुष्पदंत के अन्य नाम श्री सुविधिनाथ का तथा अंतिम तीर्थंकर श्री महावीर स्वामी के अन्य नाम वीर, अतिवीर, सन्मति और वर्धमान एवं शेष 21 तीर्थंकर एक ही नाम के है। बाल ब्रह्मचारी तीर्थंकर में श्री वासुपूज्य, श्री मल्लीनाथ ,नेमिनाथ पार्श्वनाथ तथा महावीर भगवान होते हैं।
श्री शांतिनाथ, श्री कुंथुनाथ अरनाथ चक्रवती, तीर्थंकर और कामदेव हैं। तीर्थंकर सामान्य जीव होकर तप, त्याग, धर्म का सच्चा श्रद्धान कर भावो परिणामों से 8 मुख्य कर्मों को नष्ट किया। अपने बच्चों के नाम महापुरुषों भगवान के नाम रखने से मन, जीवन में अच्छा प्रभाव होता है। लौकिक पढ़ाई के साथ धर्म के संस्कार भी जरूरी हैं। कर्म उदय में आने पर असर दिखाते हं।ै भावी तीर्थंकर राजा श्रेणिक ने साधना ,तपस्यारत यशोधर मुनिराज पर 7 वें नरक का बंध किया था। बाद ने पुण्य से आयु कर्म से प्रभाव से पहले नर्क का बंध किया।













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