22वें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ जी का मोक्ष कल्याणक इस वर्ष 20 जुलाई 2026, आषाढ़ शुक्ल सप्तमी को मनाया जाएगा। जैन आगमों के अनुसार, भगवान नेमिनाथ ने उज्जयंतगिरि, जिसे आज गिरनार पर्वत के नाम से जाना जाता है, की पांचवीं टोंक पर आषाढ़ शुक्ल सप्तमी को प्रातः काल सूर्याेदय के समय 536 मुनियों के साथ शाश्वत मोक्ष पद प्राप्त किया था। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित और संपादित प्रस्तुति…
इंदौर। 22वें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ जी का मोक्ष कल्याणक इस वर्ष 20 जुलाई 2026, आषाढ़ शुक्ल सप्तमी को मनाया जाएगा। जैन आगमों के अनुसार, भगवान नेमिनाथ ने उज्जयंतगिरि, जिसे आज गिरनार पर्वत के नाम से जाना जाता है, की पांचवीं टोंक पर आषाढ़ शुक्ल सप्तमी को प्रातः काल सूर्याेदय के समय 536 मुनियों के साथ शाश्वत मोक्ष पद प्राप्त किया था। इसी पावन स्मृति में देशभर के दिगंबर जैन मंदिरों, अतिशय क्षेत्रों और सिद्धक्षेत्रों पर विशेष आयोजन होते हैं, परंतु गिरनारजी सिद्धक्षेत्र पर होने वाला महामहोत्सव अद्वितीय माना जाता है। इस दिन मंदिरों में प्रातः महामस्तकाभिषेक, शांतिधारा, शांतिपाठ, निर्वाण कांड का पाठ, निर्वाण लाडू अर्पण, भक्तामर पाठ, दीप अर्चना और रात्रि में दीप सज्जा और भजन-कीर्तन किए जाते हैं।
नेमिनाथ-गिरनार जी धर्मयात्रा 2026
पिछले वर्ष आरंभ हुई नेमिनाथ-गिरनार जी धर्मयात्रा इस बार विश्व जैन संगठन द्वारा संजय जैन की अगुवाई में 25 जून से दिल्ली से प्रारंभ हो चुकी है। यह यात्रा दिल्ली से चलकर मध्यप्रदेश के भिंड, गुना होते हुए 18 जुलाई को इंदौर पहुंचेगी। इंदौर के बाद यात्रा गुजरात में प्रवेश करेगी और 20 जुलाई को गिरनार पर्वत की पंचमी टोंक पर पहुंचेगी। वहां हजारों श्रद्धालु एक साथ महामस्तकाभिषेक करेंगे, शांतिधारा करेंगे तथा निर्वाण कांड का सामूहिक पाठ कर निर्वाण लाडू अर्पित करेंगे। इस यात्रा का उद्देश्य गिरनारजी की वंदना के साथ युवाओं को तीर्थंकर नेमिनाथ के वैराग्य और अहिंसा के संदेश से जोड़ना है।
भगवान नेमिनाथ का जीवन और वैराग्य
भगवान नेमिनाथ का जन्म शौर्यपुरी, वर्तमान में सौराष्ट्र के द्वारका के निकट, यादव कुल में राजा समुद्रविजय और माता शिवादेवी के यहां हुआ था। वे श्रीकृष्ण के चचेरे भाई थे। विवाह के समय जब उन्होंने बारात में बंधे पशुओं का करुण क्रंदन सुना तो उनका हृदय द्रवित हो गया। उन्होंने पूछा कि ये पशु क्यों बाँधे गए हैं? उत्तर मिला कि बारातियों के भोजन के लिए। यह सुनते ही उन्होंने तत्काल वैराग्य धारण कर लिया। रथ से उतरकर विवाह मंडप छोड़ दिया और गिरनार पर्वत पर जाकर दीक्षा ले ली। यह घटना बताती है कि करुणा और अहिंसा ही उनके जीवन का मूल थी।
मंगल देशना और प्रमुख सिद्धांत
भगवान नेमिनाथ की देशना का सार ‘करुणा, वैराग्य और अपरिग्रह’ है। उन्होंने बताया कि सच्चा सुख बाह्य भोगों में नहीं, आत्म-रमण में है। उनके प्रमुख उपदेशों में अहिंसा को परम धर्म बताया गया। पशु-पक्षियों तक की रक्षा का भाव उनकी देशना का प्राण था। उन्होंने संयम को जीवन का आधार कहा और बताया कि इंद्रिय व कषाय पर नियंत्रण से ही कर्मों का क्षय होता है। अपरिग्रह पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि इच्छाओं का अंत नहीं है, अतः आवश्यकताओं को सीमित करो। मैत्री, प्रमोद, करुणा और माध्यस्थ भाव, ये चार भावनाएं उनके उपदेशों में बार-बार आईं। उन्होंने कहा कि सभी जीवों से मैत्री रखो, गुणीजनों को देखकर प्रमोद करो, दुखी जीवों पर करुणा करो और विपरीत लोगों के प्रति माध्यस्थ रहो।
दिगंबर जैन समाज के लिए संदेश
भगवान नेमिनाथ का मोक्ष कल्याणक दिगंबर परंपरा के लिए वैराग्य का प्रतीक है। दिगंबर मुनि नग्न रहकर पूर्ण अपरिग्रह का पालन करते हैं, जो नेमिनाथ के त्याग की ही परंपरा है। उनका जीवन सिखाता है कि सांसारिक वैभव क्षणभंगुर है और मोक्ष का मार्ग तप, त्याग और ध्यान से ही प्रशस्त होता है। गिरनार की वंदना को जैन शास्त्रों में ‘ऊंचा में ऊंचा उज्जयंत’ कहा गया है, क्योंकि यहां से नेमिनाथ सहित 72 करोड़ 700 मुनियों ने मोक्ष प्राप्त किया। इसलिए गिरनार की यात्रा को आत्म-शुद्धि का मार्ग माना जाता है।
आज के संदर्भ में प्रासंगिकता
आज जब हिंसा, मांसाहार और पर्यावरण दोहन बढ़ रहा है, तब नेमिनाथ का पशु-करुणा का संदेश सबसे अधिक प्रासंगिक है। उनका विवाह मंडप से लौटना बताता है कि किसी भी उत्सव के लिए जीव-हिंसा करना अनुचित है। अपरिग्रह का सिद्धांत हमें उपभोक्तावाद की अंधी दौड़ से बचाता है। युवाओं को उनके वैराग्य से प्रेरणा लेनी चाहिए कि सच्ची बहादुरी भोग में नहीं, त्याग में है। 20 जुलाई को गिरनारजी पर होने वाला महामस्तकाभिषेक केवल जल-दूध का अभिषेक नहीं, बल्कि अपने मन के कषायों को धोकर नेमिनाथ के वैराग्य, करुणा और मोक्ष-मार्ग को जीवन में उतारने का संकल्प है।













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