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अच्छे विचार और अच्छी दृष्टि ही करती है आचरण का निर्माण: आचार्य निर्भयसागर’ के बड़े जैन मंदिर में हुए मीठे प्रवचन


भावना भाव नासनी होती है। विचार विचार को पैदा करते हैं, मधुर वाणी मधुर वाणी को पैदा करती है,आचरण आचरण को पैदा करता है,पैसा पैसे को पैदा करता है। इसलिए हमेशा मधुर वाणी बोलना चाहिए। यह उद्गार आचार्यश्री निर्भयसागर जी महाराज ने बड़ा जैन मंदिर मुरैना में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर…


मुरैना। भावना भाव नासनी होती है। विचार विचार को पैदा करते हैं, मधुर वाणी मधुर वाणी को पैदा करती है,आचरण आचरण को पैदा करता है,पैसा पैसे को पैदा करता है। इसलिए हमेशा मधुर वाणी बोलना चाहिए। यह उद्गार आचार्यश्री निर्भयसागर जी महाराज ने बड़ा जैन मंदिर मुरैना में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि हमें सदैव अच्छा आचरण करना चाहिए और धन अर्जन न्याय नीति से करना चाहिए। गांधी जी ने तीन बंदर बतलाए थे-बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो, बुरा मत बोलो लेकिन, भगवान महावीर स्वामी ने दो बातें और कहीं बुरा मत सोचो और बुरा मत करो। यदि इन सिद्धांतों को जीवन में उतार दिया जाए तो नियम से सारे विश्व में शांति हो जाएगी। यदि हमारा देखने का नजरिया खराब हो तो दुनिया का नजारा बदल जाता है। इसलिए हमारी अपनी दृष्टि अच्छी होना चाहिए। विचारों का प्रदूषण उत्पन्न होने पर ही परिवार में समाज में और देश में प्रदूषण फैलता है क्योंकि, विचारों के अनुसार ही हमारा आचरण होता है। अध्यात्म के क्षेत्र में विचारों का विनिमय करना चाहिए। साधु उपदेश के माध्यम से सद विचारों का व्यापार अर्थात विनिमय करते हैं। यह विनिमय आत्मा में शांति प्रदान करता है।

आत्म-ज्ञान के लिए चिंतन रूपी औषधि 

आचार्यश्री ने जैन दर्शन में भावना भव नाशिनी के सार को समझाते हुए कहा कि-मन में निरंतर शुभ व वैराग्यपूर्ण विचारों का चिंतन करना, जो जन्म-मरण के चक्र को नष्ट कर मोक्ष प्रदान करता है। यह देहात्म-बुद्धि को कम कर आत्मा को आत्मा में रमाने का मार्ग है। मुख्य रूप से बारह भावनाएं संसार के दुःखों से विरक्ति और आत्म-ज्ञान के लिए चिंतन रूपी औषधि हैं। जिस प्रकार शरीर के लिए औषधि की आवश्यकता होती है, वैसे ही आत्मा के लिए भावनाएं संसार के दुःखों को दूर करने वाली होती हैं। ये भावनाएं मन में छिपे विकारों को नष्ट कर, आत्मा को शुद्ध और निर्मल बनाती हैं। शुभ चिंतन से नए कर्मों का आना रुकता है और पुराने कर्मों का क्षय (निर्जरा) होता है। बाहरी वस्तुओं में सुख खोजने के बजाय, ये भावनाएं आत्मा के निज सुख को पहचानने में सहायक होती हैं।

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