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पर्यावरण संरक्षण: प्रकृति और मानव का अटूट संबंध :  पर्यावरण हमारे अस्तित्व का आधार


शुक्रवार को पूरे विश्व में पर्यावरण दिवस मनाया जाएगा। धरती की सुरक्षा के लिए पर्यावरण की रक्षा करना सभी देशवासियों का कर्तव्य है। जल, वायु के साथ-साथ मानव और प्रकृति को सुरक्षित करना सबका दायित्व है। यह विशेष दिन 5 जून को अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण दिवस के रूप में विख्यात है। इस पर आज पढ़िए ब्रह्मचारी बहन डॉ. सविता जैन का यह विशेष आलेख 


रतलाम। शुक्रवार को पूरे विश्व में पर्यावरण दिवस मनाया जाएगा। धरती की सुरक्षा के लिए पर्यावरण की रक्षा करना सभी देशवासियों का कर्तव्य है। जल, वायु के साथ-साथ मानव और प्रकृति को सुरक्षित करना सबका दायित्व है। यह विशेष दिन 5 जून को अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण दिवस के रूप में विख्यात है।

1. पर्यावरण का अर्थ और इसकी परिभाषा

‘पर्यावरण’ शब्द दो शब्दों के मेल से बना है — ‘परि’ + ‘आवरण’। यहाँ ‘परि’ का अर्थ है ‘हमारे चारों ओर या चारों तरफ’ और ‘आवरण’ का अर्थ है ‘घिरा हुआ या ढका हुआ’। सरल शब्दों में कहें तो, हमारे चारों तरफ का वह घेरा जो हमें और इस पृथ्वी पर मौजूद हर जीव को घेरे हुए है, वही पर्यावरण है। यह न केवल हमारे जीवन को प्रभावित करता है, बल्कि हमारे अस्तित्व का आधार भी है।

2. पर्यावरण के मुख्य प्रकार (भेद)

व्यापक रूप से पर्यावरण को दो मुख्य भागों में विभाजित किया जा सकता है:

प्राकृतिक पर्यावरण: इसके अंतर्गत वह सब कुछ आता है जो प्रकृति ने हमें उपहार स्वरूप दिया है। इसमें जीवन के पांच मुख्य आधार (पंचभूत तत्व) शामिल हैं— पृथ्वी (भूमि), अग्नि (ऊर्जा), वायु, जल और वनस्पति। इनके बिना इस धरती पर जीवन की कल्पना भी असंभव है।

मानव निर्मित या सामाजिक पर्यावरण: इसके अंतर्गत मनुष्य का स्वभाव, उसकी आदतें, सामाजिक नियम, संस्कृति और जीवन जीने की शैली आती है। मानवीय जीवन के नैतिक मूल्य, अहिंसा, सदाचार, सात्विकता और परोपकार जैसी भावनाएं मिलकर हमारे सामाजिक पर्यावरण का निर्माण करती हैं।

3. भारतीय संस्कृति और प्रकृति का पूजनीय संबंध

हमारी भारतीय संस्कृति में प्रकृति को हमेशा सर्वोच्च स्थान दिया गया है। हमारे पूर्वज जानते थे कि प्रकृति प्रदत्त उपहारों का सम्मान करना कितना जरूरी है। यही कारण है कि:

प्रकृति का संतुलन न बिगड़े और संसाधनों का नुकसान (अपकार) न हो, इसलिए जल स्रोतों (नदियों, कुओं), वृक्षों, अग्नि और वायु को देवताओं का रूप मानकर उनकी पूजा की जाती है।

इस परंपरा के पीछे मुख्य उद्देश्य यह था कि मनुष्य इन प्राकृतिक संसाधनों का दोहन केवल अपनी आवश्यकतानुसार करे, न कि अपने लालच के लिए।

इस भूमंडल पर उपस्थित सभी जैविक (सजीव) और अजैविक (निर्जीव) तत्व एक-दूसरे से पूरी तरह जुड़े हुए हैं और एक-दूसरे के पूरक हैं।

4. आधुनिक युग की चुनौतियाँ 

आज ‘आधुनिकता’ और ‘विकास’ की आँधी दौड़ में मनुष्य ने प्रकृति के नियमों को ताक पर रख दिया है। जिसके कारण हमें कई गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है:

अंधाधुंध दोहन: कारखानों, शहरीकरण और विलासिता के लिए जंगलों को काटा जा रहा है और भूजल का स्तर लगातार गिर रहा है।

प्रदूषण का संकट: हवा में ज़हर घुल चुका है, नदियाँ प्रदूषित हो चुकी हैं और प्लास्टिक के कचरे ने पूरी धरती को पाट दिया है।

ग्लोबल वार्मिंग (वैश्विक ताप): जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम का चक्र बिगड़ गया है। कहीं सूखा तो कहीं बिन मौसम भारी बाढ़ आ रही है।

प्रकृति के अत्यधिक दोहन के कारण न केवल इंसान, बल्कि पृथ्वी पर रहने वाले सभी जीव-जंतु एक ऐसे प्रदुषित वातावरण में जीने को विवश हैं, जहाँ एक स्वस्थ जीवन की कल्पना करना भी नामुमकिन होता जा रहा है।

5. हमारा कर्तव्य और समाधान 

पर्यावरण दिवस केवल एक दिन मनाने या भाषण देने का विषय नहीं है, बल्कि इसे अपने दैनिक जीवन में उतारने की आवश्यकता है। हम छोटे-छोटे प्रयासों से बड़ा बदलाव ला सकते हैं:

‘एक व्यक्ति, एक पेड़’ का संकल्प: अपने जीवन के विशेष अवसरों (जैसे जन्मदिन) पर कम से कम एक पौधा अवश्य लगाएं और उसकी देखभाल करें।

जल की हर बूंद की कीमत समझें: वर्षा के जल का संचयन (Rainwater Harvesting) करें और घर में पानी की बर्बादी रोकें।

प्लास्टिक को कहें ‘ना’: सिंगल-यूज़ प्लास्टिक का उपयोग पूरी तरह बंद करें और कपड़े या जूट के थैलों का इस्तेमाल करें।

संसाधनों का पुनर्चक्रण (Recycle): कचरे का सही प्रबंधन करें— गीला कचरा और सूखा कचरा अलग रखें ताकि उनका सही से निस्तारण हो सके।

निष्कर्ष

पर्यावरण सुरक्षित रहेगा, तभी हमारा और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित रहेगा। प्रकृति हमें सब कुछ उपहार में दिया है लेकिन यदि हमने प्रकृति के विनाश को नहीं रोका, तो इसके परिणाम बेहद विनाशकारी हो सकते हैं। आइए, आज हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि हम प्रकृति का शोषण नहीं, बल्कि उसका पोषण करेंगे।

“पर्यावरण संरक्षण ही जीवन का आधार है।”

– ब्रह्मचारी डॉ. सविता जैन अधिष्ठात्री

श्री दिगम्बर जैनधर्मस्थल शीतल तीर्थ रतलाम

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