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आहार दान देने से भव्य जीव तीर्थंकर श्री शांतिनाथ बने : आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने प्रातः दान का महत्व और व्यसन के दुष्परिणामों को बताया


आर्यिका श्री सुपार्श्वमति जी की समाधि स्थली श्री चन्द्रप्रभ जिनालय में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी चंद्रप्रभ जिनालय में 36 साधु सहित ग्रीष्म कालीन वाचना हेतु विराजित हैं। प्रतिदिन चुड़ीवाल परिवार की ओर से चंद्रपुरी में चातुर्मास के लिए श्रीफल चढ़ाया जाता हैं। जयपुर से पढ़िए, यह खबर…


जयपुर। आर्यिका श्री सुपार्श्वमति जी की समाधि स्थली श्री चन्द्रप्रभ जिनालय में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी चंद्रप्रभ जिनालय में 36 साधु सहित ग्रीष्म कालीन वाचना हेतु विराजित हैं। प्रतिदिन चुड़ीवाल परिवार की ओर से चंद्रपुरी में चातुर्मास के लिए श्रीफल चढ़ाया जाता हैं। मॉर्निंग वॉक ग्रुप ने श्याम नगर तथा अन्य कॉलोनी से पवन कुमार गंगवाल, कमल कुमार चांदवाड़, विनोद कुमार पांड्या, प्रदीप कुमार चूड़ीवाल, सुरेश सबलावत, रवींद्र कुमार पाटनी, पुखराज बाकलीवाल, शैलेष सोगानी ने आचार्य श्री के कक्ष में अध्ययन प्राप्त किया। धीरे-धीरे यह धर्म की बयार, धर्म की गंगा में भक्तों की संख्या सैकड़ों हो गई। दोपहर से किशनगढ़ के सैकड़ों भक्तों ने वर्ष 2026 के चातुर्मास के लिए निवेदन किया। बुधवार को आर्यिका श्री पद्मयश मति जी ने केश लोचन किए। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने प्रातः दान का महत्व और व्यसन के दुष्परिणामों को बताया। दान- अपने और पर के उपकार के लिए चतुर्विधसंघ (मुनि, आर्यिका, श्रावक, श्राविका) को जो दान दिया जाता है, वह दान कहलाता है। सुरेश सबलावत, भागचंद चूड़ीवाल के अनुसार आचार्य श्री वर्धमान सागरजी ने दान के चार प्रकार में बताया कि आहार दान, औषधदान, ज्ञानदान, अभयदान होते हैं।

मुनि, आर्यिका, श्रावक, श्राविका आदि उत्तम, मध्यम, जघन्य पात्रों को यथाशक्ति नवधा भक्तिपूर्वक सप्तगुण सहित जो दान दिया जाता है वहआहार दान है। श्रीषेण राजा आहार दान में प्रसिद्ध हुए हैं। श्रीषेण राजा ने श्री अमित ओर श्री अरिंजय मुनिराज को आहार दान दिया। पुण्य से भोग भूमि में देव होकर मनुष्य गति में 16 वें तीर्थंकर श्री शांतिनाथ हुए। रोग को दूर करने के लिए शुद्ध निर्दोष औषधि से उपचार करना औषधिदान है औषधि दान में सेठ पुत्री वृषभसेना प्रसिद्ध को प्राप्त हुई। इस दान के फल स्वरुप उसे सर्वोषधी रिद्धि प्राप्त हुई। जिसके प्रभाव से उसके स्नान के जल से सभी भयंकर रोग और विष दूर हो जाते थे।शास्त्र दान के प्रभाव पुण्य से ग्वाला बाद में जिनवाणी के पारंगत श्रुत केवली श्री कुंदकुंद आचार्य हुए। जीवों को भय से निकालना, उनकी रक्षा करना और भवन आदि बनवाना अभय दान है अभय दान में सुकर प्रसिद्धि को प्राप्त हुआ। व्यसन बुरी आदतों को व्यसन कहते हैं। व्यसन अर्थात् खोटी, बुरी आदत जो आत्मा के स्वरूप को भुला दे तथा आत्मा का कल्याण न होने दें, उसे व्यसन कहते हैं। व्यसन सेवन करने वाले व्यसनी कहलाते हैं।वव्यसन सात होते हैं- जुआ खेलना, मांस खाना,शराब पीना,वेश्या गमन, शिकार खेलना,चोरी करना, परस्त्री सेवन करना। धन, सम्पत्ति, रुपये-पैसे आदि से हार-जीत की शर्त लगाकर किसी भी खेल को खेलने की आदत, जुआ खेलना व्यसन कहलाता है।यह सभी व्यसनों का मूल पाप की खान है। जुआ व्यसन में ‘पाण्डव’ प्रसिद्धि को प्राप्त हुए।

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