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जीवन में सु मरण के बिना मोक्ष नहीं मिलता : धर्माचार्य कनक नंदी जी ने जन्म और मरण के रहस्य को गहराई से समझाया


केवली भगवान के बिना कोई आचार्य,उपाध्याय, साधु अनंत को नहीं जान सकते क्योंकि, अनंत को जानने के लिए अनंत नॉलेज चाहिए। अनंतानंत बार इस जीव ने जन्म मरण किया है अतः मरण के नाम से सभी को डर लगता है। यह प्रबोधन धर्माचार्य कनक नंदीजी ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में दिया। डडूका से अजीत कोठिया की रिपोर्ट…


डडूका। केवली भगवान के बिना कोई आचार्य,उपाध्याय, साधु अनंत को नहीं जान सकते क्योंकि, अनंत को जानने के लिए अनंत नॉलेज चाहिए। अनंतानंत बार इस जीव ने जन्म-मरण किया है, अतः मरण के नाम से सभी को डर लगता है। यह प्रबोधन धर्माचार्य कनक नंदीजी ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में दिया। उन्होंने बताया कि निगोदिया, नित्य निगोदिया जीव अनादि काल से अभी तक कृमि, किट पशु पक्षी मनुष्य नहीं बने हैं। इतर निगोदिया में निगोद से निकलकर कृमि, कीट, पशु, पक्षी और मनुष्य आदि बनते हैं। सभी निगोदिया जीव मिथ्या दृष्टि ही होते हैं। निगोदिया में जीव अनंतानंत बार जन्म-मरण करता है। एक श्वास में 8-10 बार जन्म-मरण करता है। जैन धर्म में ही सुमरण का वर्णन है। सही मरण से मोक्ष मिलेगा। यह पंडित मरण है। सामान्य जीव मरण से भयभीत रहते हैं परंतु, सम्यक दृष्टि मरण से नहीं डरता, वह जानता है कि मरण मेरे शरीर का होगा मेरी आत्मा का नहीं। प्रति समय मरण होता है उसे अविचीमरण कहते हैं। समय से पहले आकस्मिक मरण होना अकाल मरण है। आयु के पूर्ण होने पर मरना सकाल मरण है। मरण का शासन कर्मानुसार है। मृत्यु शरीर की होती है आत्मा की नहीं। जन्म मरण से परे अमृत अवस्था होती है। जिसमें दुबारा जन्म-मरण नहीं होता है। गर्भ में नहीं जाना पड़ता है। उन्होंने आगे कहा कि हर द्रव्य में अनेकांत है अनेकांत वस्तु स्वरूप है।

साधारण आहार एक समान आहार एक साथ उच्श्वास, एक साथ निश्वास। साधारण वनस्पति एक समय में अनंत जीव एक साथ उत्पन्न होते हैं। आचार्यश्री ने बताया कि मनुष्य के शरीर में जितने वायरस बैक्टीरिया है, उतने पूरी पृथ्वी में पशु-पक्षी भी नहीं है। आत्मविश्वास ज्ञान चरित्र समता शांति से मरण को मार सकते हैं। संयमी व ज्ञानी की मृत्यु पंडित मरण तथा अज्ञानी जीवों का मरण बालमरण होता है। कर्मक्षय से ही मृत्यु को जीता जाता है, यह मृत्यु के प्रति निर्भयता दर्शाता है। यह जानकारी विजयलक्ष्मी गोदावत सागवाड़ा ने दी।

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