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पुणे विवि में दिगंबर मुनि को गोष्ठी में प्रवेश से रोका : भारत की प्राचीन जैन विरासत’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी में मुख्य वक्ता के रूप में आमंत्रित मुनि अक्षय सागर जी को कार्यक्रम स्थल से लौटाया गया


नालंदा-तक्षशिला की ज्ञान परंपरा वाले इस देश में एक विश्वविद्यालय द्वारा आमंत्रित दिगंबर जैन संत को कार्यक्रम स्थल पर प्रवेश से रोक देना, हमारे शिक्षा केंद्रों के संस्कार-विहीन होते जाने का शर्मनाक उदाहरण बन गया है। बदनावर से पढ़िए, यह खबर…


बदनावर (वर्द्धमानपुर)। भारतीय संस्कृति की पहचान ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और ‘अतिथि देवो भव:’ से है। नालंदा – तक्षशिला की ज्ञान परंपरा वाले इस देश में एक विश्वविद्यालय द्वारा आमंत्रित दिगंबर जैन संत को कार्यक्रम स्थल पर प्रवेश से रोक देना, हमारे शिक्षा केंद्रों के संस्कार-विहीन होते जाने का शर्मनाक उदाहरण बन गया है। वर्द्धमानपुर शोध संस्थान के ओम पाटोदी ने बताया कि हाल ही में सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय के पुरातत्व एवं इतिहास विभाग द्वारा भारत सरकार की ‘भारतीय ज्ञान परंपरा’ योजना के तहत “भारत की प्राचीन जैन विरासत” विषय पर संगोष्ठी आयोजित की गई थी। इस संगोष्ठी में मुख्य वक्ता के रूप में दिगंबर जैन संत मुनि श्री अक्षय सागर जी महाराज को विधिवत आमंत्रण भेजा गया और उनकी स्वीकृति भी ली गई। तपती गर्मी में पैदल विहार करके जब मुनिश्री कार्यक्रम स्थल पर पहुँचे, तो विश्वविद्यालय प्रशासन ने उनके दिगंबर स्वरूप का हवाला देकर प्रवेश देने से इनकार कर दिया।

इस घटनाक्रम से तीन बड़े सवाल जो शिक्षा व्यवस्था पर उठ गये है।

1. अज्ञानता की पराकाष्ठा – जिस जैन धर्म पर संगोष्ठी हो रही थी, आयोजकों को उसी धर्म के *दिगंबर संतों के स्वरूप* की जानकारी तक नहीं।

 

2. प्रशासनिक लापरवाही – मुख्य वक्ता को बुलाकर उनके बारे में बुनियादी जानकारी न रखना, विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है।

 

3. ‘अतिथि देवो भव’ का अपमान – घर बुलाकर मेहमान को दरवाज़े से लौटाना भारतीय संस्कृति की मूल भावना की धज्जियाँ उड़ाना है।

 

वर्द्धमानपुर शोध संस्थान के ओम पाटोदी ने कहा कि “यह घटना केवल एक संत का नहीं, हमारी हज़ारों वर्ष पुरानी श्रमण संस्कृति, तप, त्याग और अहिंसा की परंपरा का अपमान है। दिगंबरत्व वस्त्र-त्याग नहीं, समस्त परिग्रहों के त्याग का प्रतीक है। भारत की पहली महिला शिक्षिका सावित्रीबाई फुले के नाम पर बने विश्वविद्यालय में यह कृत्य उनके नाम को भी बट्टा लगाता है। ऐसा लगता है कि ये आयोजन समिति के लोग भारत के नहीं होकर किसी दूसरी दुनिया से आएं हों जिन्हें भारत के अति प्राचीन धर्म संस्कृति के बारे में कोई जानकारी ही नहीं।

वर्द्धमानपुर शोध संस्थान के ओम पाटोदी सहित राजेश जैन फुलजी बा, राजमल सूर्या, मुकेश विनाक्या, सुरेन्द्र मूणत, राजेंद्र सराफ, अनिल लुनिया, सर्वेश मंडलेचा, सौरभ जैन, प्रवीण जैन, विपिन जैन, पवन पाटोदी, सुशील मोदी, ललित गोधा, स्वप्निल जैन, अभय पाटोदी आदि सदस्यों ने एवं वरिष्ठ समाजजन व प्रबुद्ध नगर वासियों ने उक्त घटना पर विरोध जताते हुए सावित्रीबाई फुले विश्वविद्यालय के दोषी अधिकारियों से सार्वजनिक रूप से माफी माँगने की माँग की है। साथ ही शिक्षा विभाग द्वारा उन पर यथोचित कार्रवाई की भी माँग की है।

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