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धर्म के कार्यों में कभी बचा हुआ धन समय मत देना : मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने धर्मशास्त्रों के आधार पर दी मंगल देशना


मुनिश्री सुधासागर जी महाराज इन दिनों जबलपुर क्षेत्र में विहाररत हैं। वे रास्ते मे आने गांव, शहर में अपने मंगल प्रवचन से धर्म जागरण कर रहे हैं। गुरुवार को भी उन्होंने मंगल देशना दी है। जबलपुर से पढ़िए, राजीव सिंघई की यह खबर…


जबलपुर। मुनि श्री सुधासागर जी महाराज ने गुरुवार को धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि ये व्यक्ति या वस्तु मेरी हो जाये, ये धन मेरा हो जाये, सारी दुनिया मेरे काम आवे, सभी लोगों की सहानुभूति मेरे साथ हो, भगवान की कृपा मेरे ऊपर बनी रहे, जितनी भी तुम क्रियाये कर रहे हो, सब में तुम्हारा कही न कही स्वार्थ जुड़ा हुआ है। धर्मशास्त्रों में धर्मात्मा अपराध करने के बाद गुरु के पास बिना बुलाये जाता है और अदालत में वॉरेंट जारी होता है तब जाता है। जो गलती करके स्वयं प्रायश्चित लेता है तो तपस्वी है, जिसे गलती के बाद सजा दी जाती है, वो अपराधी कहलाता है।

णमोकार मंत्र पढ़ना है, यह मैं जपूंगा

महानुभाव धर्म छोड़ने की बात जब कोई कहे, वो कोई भी हो, भगवान भी कहे कि तू मेरा नाम छोड़ दे तो तू बच जाएगा तो भी भगवान की बात मत मानना। कोई तुम्हे तीन लोक राजा बनाये, बस णमोकार छोड़ दो तो तुम कहना न मुझे भगवान बनना है न राजा, मुझे णमोकार मंत्र पढ़ना है, यह मैं जपूंगा। धर्मकार्य कोई छोड़ने की बात करें, समझ लेना उसकी नियत अच्छी नहीं है, इसलिए कभी भी धर्म को, गुरु को, भगवान को दांव पे मत लगाना। इनके बदले में तुम्हें कुछ भी मिले, चाहे भगवान का पद भी हो तो ठुकरा देना लेकिन देव-शास्त्र-गुरु को नही ठुकराना। सम्यकदृष्टि कहता है कि मैं दरिद्र बनूँ या मैं नरकों में पडूँ ये मंजूर है बस मेरा धर्म, मेरा व्रत नहीं छूटना चाहिए, ऐसी श्रद्धा होती है, तब सम्यकदर्शन होता है।

सिद्धियाँ किसी मंत्र से नहीं

तुमने माँ बाप से जन्म तो लिया है लेकिन तुम माँ बाप को सिद्ध नहीं कर पा रहे हो। कितनी कीमत है माँ बाप की, माँ बाप को तुम कितने में छोड़ देंगे कितने में उनकी उपेक्षा कर देंगे। वे खुद की दौलत में हिस्सा कम दे दे तो भी तुम उनकी उपेक्षा कर देते हो। कितने में छोड़ दोंगे धर्म, बस 2 मिनिट लगते है, थोड़ी सी परिस्थितियाँ आई या प्रतिकूलता हुई, मंदिर जाना बंद। बलिदान की बात कर रहा हूँ, तुम मंदिर जाओगे तो मौत होगी, करो घोषणा है, मुझे मंजूर है। कोई नियम छोटा बड़ा नहीं होता, बस उसके पीछे बलिदान क्या है तुम्हारा। सिद्धियाँ किसी मंत्र से नहीं, मंत्र से की हुई सिद्धियां दुर्गति का कारण है। बचे हुए धन से कभी पाप मत करना लेकिन बचे हुए धन को धर्म में देने का संकल्प भी मत करना।

इसने अपने भोजन करने के पहले दिया है

कभी धर्म के कार्यो में, अच्छे कार्यो में कभी भी ये भाषा प्रयोग मत करना- जैसा समय रहा तो कर लेंगे, बचेगा तो दान दूँगा। तुम्हारे खाने के बाद साधु को दोगे तो वह भीख है और महाराज के खाने के बाद खाओगे तो वो प्रसाद बना दिया। बचा हुआ धन, बची हुई रोटी भिखारी को दिया जाती है। इसी प्रकार धर्म के कार्यो में कभी मत कहना कि समय रहेगा तो आऊँगा। दुनिया मे हजारों लोगों को कोई खिला दे तो उसकी प्रशंसा नहीं की और यहाँ दिगम्बर मुनि को एक दाना, एक ग्रास देकर आ जाये तो गजब प्रशंसा की, कारण क्या है? कोई कारण नहीं, सवाल है इसने अपने भोजन करने के पहले दिया है, इसलिए उसमे अतिशय है।

तुम्हारी सात पीढ़ियाँ सुरक्षित हो जाएगी

कभी कोई बच्ची देखने जाओ, जिसके माँ बाप ने दहेज का धन दान में दे दिया हो, रात्रि में, आलू प्याज नहीं खाती हो, फैशनेबल कपड़े नहीं पहनती हो, भगवान के दर्शन के बिना भोजन नहीं करती हो तो ओ मेरे भक्तों उसे बहू को बहू मानकर मत लाना, देवी मानकर लाना, जाओ तुम्हारी सात पीढ़ियाँ सुरक्षित हो जाएगी।

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