श्याम नगर जयपुर के आदिनाथ मंदिर में प्रवचन में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने मैत्री, अनुशासन, संस्कार, जीवन शैली में बदलाव आदि बातों पर उपदेश में बताया कि सभी जीवों से मैत्री” छोटा हो या बड़ा, मनुष्य हो या तिर्यंच (पशु-पक्षी) देव हो या अन्य जीव सबके प्रति एक ही भावना-सभी सुखी रहें। जयपुर से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर…
जयपुर। श्याम नगर जयपुर के आदिनाथ मंदिर में प्रवचन में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने मैत्री, अनुशासन, संस्कार, जीवन शैली में बदलाव आदि बातों पर उपदेश में बताया कि सभी जीवों से मैत्री” छोटा हो या बड़ा, मनुष्य हो या तिर्यंच (पशु-पक्षी) देव हो या अन्य जीव सबके प्रति एक ही भावना-सभी सुखी रहें। मित्रता सीमित होती है (कुछ लोगों तक), उसमें शत्रुता भी हो सकती है लेकिन मैत्री सर्वव्यापी (सबके लिए) इसमें किसी के प्रति बैर नहीं होता। घर से ही शुरू होती है साधना हम बाहर तो बड़ी-बड़ी बातें करते हैं लेकिन घर में ही झगड़े होते हैंपति-पत्नी में मतभेद परिवार में टकराव जब घर में शांति नहीं तो बाहर की बातें व्यर्थ हैं।
पहले सादगी थी मर्यादा थी
सुरेश सबलावत ने बताया कि आचार्य श्री ने आगे कहा कि अनुशासन जीवन शास्त्र के अनुसार चलना चाहिए। जब जीवन में अनुशासन होगा तब ही सुख और शांति आएगी। बिना अनुशासन टकराव और अशांति निश्चित है। हमारी जीवन शैली भी बदल गई है। चूल्हा, गैस से श्रम कम होकर आराम होकर व्यायाम के अभाव में शरीर कमजोर (जैसे घुटनों की समस्या) हो रहा है। अपने घर का वातावरण कैसा है? शांति है या तनाव? संस्कार हैं या केवल सुविधा? पहले सादगी थी,मर्यादा थी ,आज टीवी, मोबाइल, सुविधाएँ लेकिन, इनका सही उपयोग ही लाभकारी है। बच्चों को कैसे संस्कारित करें। बच्चों को उपदेश से नहीं अपने आचरण से सिखाएं खुद मोबाइल छोड़ेंगे,बच्चे सीखेंगे, खुद संयम रखेंगे, बच्चे अपनाएंगे। भोजन करते समय ध्यान होना चाहिए तभी स्वाद और स्वास्थ्य दोनों मिलते हैं। जब आपका जीवन आदर्श बनेगा लोग अपने आप प्रेरित होंगे धर्म केवल बोलने की चीज नहीं जीने की चीज है।
अपने जीवन को श्रेष्ठ बनाने के उद्देश्य से एकत्रित हुए हैं
मैत्री भाव अपनाओ घर से शुरुआत करो बच्चों को आचरण से सिखाओ याद रखें। पहले स्वयं बनो, फिर संसार बदलेगा संघस्थ आर्यिका महायशमती माताजी ने प्रवचन में श्रावक, श्राविकाओं के कर्तव्य, आने वाली पीढ़ी के प्रति दायित्व, देव दर्शन धर्म के संस्कार आदि पर सरल भाषा में प्रभावी उपदेश में बताया कि आप सभी यहां अपने जीवन को श्रेष्ठ बनाने के उद्देश्य से एकत्रित हुए हैं। जब से आचार्य श्री का जयपुर महानगर में पदार्पण हुआ है, तब से निरंतर ज्ञान की गंगा प्रवाहित हो रही है और आप सभी उस ज्ञान में डुबकी लगाकर अपने जीवन को पावन बना रहे हैं। श्रावक-श्राविकाओं के मुख्य कर्तव्य हैं-देव पूजा, गुरु भक्ति (वैयावृत्य)। श्याम नगर में यह देखकर अत्यंत प्रसन्नता होती है कि यहां जिनागम अनुसार अभिषेक, पूजन और आराधना की परंपरा निरंतर चल रही है। आने वाली पीढ़ी के लिएअब हमारा कर्तव्य है कि अपने बच्चों को धर्म से जोड़ें। उन्हें प्रतिदिन जिनेंद्र भगवान के दर्शन कराएं ।













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