इंदौर । विश्वभर में महिला दिवस 08 मार्च को मनाया जाता है. इसकी खास वजह ये है कि इसी दिन अमेरिका के महिलाओं ने अपने अधिकारों के मांग की लड़ाई शुरू की थी. बाद में सोशलिस्ट पार्टी द्वारा इस दिन को महिला दिवस मनाने का ऐलान किया गया। फिर इसके बाद यूरोप की महिलाओं ने भी बाद में 8 मार्च को रैलियां निकाली. इसके बाद साल 1975 में संयुक्त राष्ट्र ने 08 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाने के लिए मान्यता दी।
स्त्री, यानी सृष्टि की वो रचना, जिसे प्रकृति ने संतति को जन्म दे कर इस संसार को चलाए रखने का गुरुतर दायित्व सौंपा है। स्त्री समाज और धर्म की आदि शक्ति है। सनातन संस्कृति में विद्या, धन और संहार का दायित्व देवियों को सौंपा गया है, वहीं जैन दर्शन तो हमेेशा से ही स्त्री शक्ति को महत्व देता आया है। प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ ने अपनी पुत्रियों को शिक्षा दिला कर जैन दर्शन में उस संस्कार को परिचालित कर दिया था जो यह कहता है कि समाज में स्त्री और पुरूष में कोई भेद नहीं है। सृष्टि को चलाए रखने के लिए दोनों ही जरूरत है। भगवान आदिनाथ ने यह संदेश भी दिया कि स्त्री को तो समाज को संस्कारित और शिक्षित भी करना है। वैसे भी एक स्त्री दो कुल अपने पीहर और अपने सुसराल को शिक्षित व संस्कारित कर सकती है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर “मंथन’’ के इस बार के अंक में हमने जैन दर्शन और भारतीय संस्कृति में महिलाओ के महत्व को ही सामने लाने का प्रयास किया है।
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के उपलक्ष्य में श्रीफल जैन न्यूज ने आठ विशेष आलेख प्रकाशित किए हैं। आप इन्हें इन लिंक्स पर पढ़ सकते हैं….
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राष्ट्रप्रेम का परिचय देते हुए आंदोलनकारी गतिविधियों से जुड़ीं जैन महिलाएं
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