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आजादी की लड़ाई में जैन महिलाओं का अवदान : राष्ट्रप्रेम का परिचय देते हुए आंदोलनकारी गतिविधियों से जुड़ीं जैन महिलाएं


आधुनिकीकरण, भूमंडलीकरण के बीच महिलाओं का बदलता मानस पटल आधी आबादी को जागरूक एवं गतिशील बना रहा है। भारतीय समाज एवं संस्कृति में पुरुष-नारी दोनों की भूमिका को कंधे से कंधा मिलाकर चलने जैसा माना गया है। भारतीय संविधान में भी स्त्री-पुरुष दोनों को सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक अधिकार समान रूप से प्राप्त हैं। आज शिक्षा का बढ़ता दायरा, महिला संगठन एवं अधिकारों के प्रति चेतना से महिलाओं का आत्म विश्वास बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है। जैन परंपरा में भी नारी को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। धर्म कला, संस्कृति आदि में नारी को समान अधिकार प्राप्त हैं। जैन धर्म की इसी उदार भावना ने जहां नारी को पारिवारिक, सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाया, वहीं उसे आत्म कल्याण की और भी प्रेरित किया। भगवान आदिनाथ से लेकर भगवान महावीर तक और भगवान महावीर से लेकर आज तक जैन नारियों के प्रति उदारवादी दृष्टिकोण की परंपरा विरासत से चली आ रही है। हमारा देश एक लंबे समय तक पराधीन रहा और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष चलता रहा। आजादी के इतिहास और नवराष्ट्र के निर्माण की धारा में देश की महिलाओं के अवदान का सही-सही आकलन नहीं हो पाया है। जैन महिलाओं का मूल्यांकन तो न के बराबर है। प्रस्तुत लेख के माध्यम से उनके अवदान को रेखांकित करने का प्रयास किया गया है।   


इतिहास साक्षी है कि स्वाधीनता के इस महासमर में महिलाओं ने अपनी सामाजिक सीमा को ध्यान में रखते हुए पूरे जोशोखरोश के साथ कदम से कदम मिलाकर राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लिया। उस समय स्त्रियों का कार्यक्षेत्र घर की चारदीवारी तक सीमित था। फिर भी महिलाओं ने स्वतंत्रता आंदोलनों में हिस्सा लिया। अंग्रेजों की दासता से मुक्ति पाने की इस लड़ाई में अनेक वीर महिलाएं सामने आईं जिन्होंने अपना सब कुछ अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ाई में समर्पित कर दिया। स्वतंत्रता की इस लड़ाई में प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से उनके योगदान को समाज और देश कभी नहीं भूल पाएगा। स्वाधीनता के समय में जब अनेक नारियों ने अपनी सक्रियता दिखाई तो जैन महिलाएं भी सामने आईं। यद्यपि यह वह समय था जब महिलाओं में विशेष जागृति नहीं थी। परंपरागत, रुढि़वादी परिवारों में घूंघट आदि प्रथा के कारण घर से बाहर निकल कर काम करना ठीक नहीं समझा जाता था फिर भी जैन महिलाएं घर से बाहर निकलीं और आजादी के लड़ाई में सक्रिय बनीं। आजादी के दीवानों और क्रान्तिकारियों के परिवार तो अपने आप ही इस लड़ाई में शामिल हो गए थे। जैन महिलाएं अपने राष्ट्रप्रेम का परिचय देते हुए आंदोलनकारी गतिविधियों से जुड़ गईं। घर-घर चरखे काते जाने लगे और खादी एवं स्वदेशी भावना का प्रचार हुआ। विदेशी कपड़ों की होलियां जलाई गयीं, शराब की दुकानों पर धरना दिया गया। महिलाओं के शिक्षित वर्ग ने लेख, गीत, भाषण आदि के माध्यम से आंदोलन की गति को बनाए रखा। महिलाओं की सक्रियता यहां तक हो गयी कि सभाएं, धरना, जुलूस आदि निकालना साथ ही लाठी, गोली खाकर जेल तक जाने का कार्यक्रम शुरू हो गया। इस तरह इन महिलाओं ने अपना सबकुछ देश के लिए न्योछावर करने की ठान ली। उनके जुझारू संघर्ष का चरित्र सदैव प्रेरणा प्रदान करता रहेगा।

आइए! भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में समर्पित उन जैन वीर महिलाओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें जिन्होंने सक्रियता से भारत मां को परतन्त्रता की बेडिय़ों से आजाद कराया। आगरा की श्रीमती अंगूरी देवी जिन्होंने आजादी के आंदोलन में वह अलख जगाई कि आगरा नगर ‘इन्कलाब जिन्दाबाद’ के नारों से गूंज उठा। अपने पति महेन्द्र जैन के साथ कंधे से कंधा मिलाकर स्वतंत्रता आन्दोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। 1930 में एक सभा में भाषण करने के दौरान पुलिस ने गिरफ्तार कर इन्हें जेल भेज दिया। उस समय आप गर्भवती थीं। नमक सत्याग्रह के दौरान आप पुन: गिरफ्तार हुईं। 1932 के सत्याग्रह आन्दोलन में आपने अनेक क्रांतिकारी गतिविधियों को अंजाम दिया। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भी सक्रिय भूमिका निभाई। उनका कहाना था कि अपनी सभ्यता एवं संस्कृति को सहेजकर रखना प्रत्येक महिला का कर्तव्य है। अजमेर के प्रसिद्ध देशप्रेमी जीतमल लूणिया की धर्मपत्नी श्रीमती सरदार कुंवरबाई लूणिया राष्ट्रीय आन्दोलन में भाग लेने के कारण अपने तीन वर्षीय पुत्र के साथ जेल में रहीं। मेरठ की श्रीमती कमला देवी को ‘सविनय अवज्ञा आन्दोलन’ में भाग लेने के कारण जेल की सजा भुगतनी पड़ी। कनपुर के प्रसिद्ध देशभक्त वैद्य कन्हैयाला जैन की धर्म पत्नी गंगाबाई जैन ने न केवल स्वदेशी का प्रचार किया अपितु साइमन कमीशन वापिस जाओ, दांडी यात्रा, नमक सत्याग्रह आदि आन्दोलनों द्वारा महिलाओं को जागृत किया एवं कारावास झेलना पड़ा। नागपुर की श्रीमती धनवती बाई रांका और उनकी देवरानी श्रीमती सरस्वती देवी रांका राष्ट्रीय आंदोलनों में भाग लेने के कारण अनेक बार जेल गयीं। 1942 के राष्ट्रव्यापी आंदोलन में अहमदाबाद की जयावती संघवी शहीद हो गयीं। प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी पं.परमेष्ठीदास जी की पत्नी श्रीमती कमला देवी को सभाबन्दी कानून भंग करने के कारण पांच महीने साबरमती जेल में रहना पड़ा। कानपुर की श्रीमती कमला सोहनराय ने राष्ट्रीय आन्दोलनों में समर्पित भाव से अपनी भूमिका निभायी एवं जेल यात्रा की। पूज्य बापू के आश्रम में रहने वाली कांचन जैन ने भी आंदोलन के दौरान कारावास की सजा भोगी। ललितपुर की श्रीमती केशरबाई ने तन-मन-धन से आंदोलन में भाग लिया।

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