आकाश की अनंतता, पर्वतों की निस्तब्धता, नदियों की कलध्वनि, वृक्षों की हरित छाया और वायु की जीवनदायिनी स्पर्श-स्मृति ने उसके भीतर यह अनुभूति अवश्य जगाई होगी कि वह इस सृष्टि का स्वामी नहीं, अपितु उसका एक अत्यंत छोटा सहभागी मात्र है। विश्व पर्यावरण दिवस पर पढ़िए, आज सुनील सुधाकर शास्त्री द्रोणगिरि सागर का यह विशेष आलेख…
मनुष्य ने जब पहली बार पृथ्वी पर आँखें खोली होंगी, तब उसने स्वयं को प्रकृति की विराट गोद में पाया होगा। आकाश की अनंतता, पर्वतों की निस्तब्धता, नदियों की कलध्वनि, वृक्षों की हरित छाया और वायु की जीवनदायिनी स्पर्श-स्मृति ने उसके भीतर यह अनुभूति अवश्य जगाई होगी कि वह इस सृष्टि का स्वामी नहीं, अपितु उसका एक अत्यंत छोटा सहभागी मात्र है। भारतीय संस्कृति का समूचा आध्यात्मिक चिंतन इसी विनम्र अनुभूति से जन्म लेता है। यहाँ प्रकृति केवल भौतिक संसाधन नहीं रही; वह संवेदना, श्रद्धा और सह-अस्तित्व की जीवंत अभिव्यक्ति रही है।
आज जब पृथ्वी का हृदय प्रदूषण से आहत है, नदियाँ विषाक्त हो रही हैं, वनों का हरापन मशीनों के शोर में विलीन होता जा रहा है, वायु जीवनदायिनी के स्थान पर रोगवाहिनी बनती जा रही है और मनुष्य अपनी ही सभ्यता के धुएँ में भविष्य खोजने को विवश है, तब यह प्रश्न अत्यंत प्रासंगिक हो उठता है कि क्या आधुनिकता की अंधी दौड़ में हमने अपनी सांस्कृतिक दृष्टि खो दी है? क्या विकास के नाम पर हमने उस प्रकृति को ही नष्ट करना आरंभ कर दिया है, जिसके बिना हमारा अस्तित्व असंभव है?
प्राचीन भारतीय संस्कृति का सबसे अद्भुत पक्ष यह रहा कि उसने प्रकृति को उपभोग का विषय नहीं, बल्कि उपासना का विषय बनाया। यही कारण है कि यहाँ पृथ्वी माता है, गंगा केवल नदी नहीं बल्कि जीवनधारा है, वटवृक्ष केवल वनस्पति नहीं बल्कि दीर्घायु चेतना का प्रतीक है, पर्वत देवत्व के प्रतीक हैं और अग्नि, वायु, जल तथा सूर्य तक पूजनीय माने गए। यह दृष्टिकोण किसी अंधविश्वास का परिणाम नहीं था; यह प्रकृति-संरक्षण का अत्यंत सूक्ष्म सांस्कृतिक विज्ञान था।
ऋग्वेद का उद्घोष-
“माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः”
अर्थात् पृथ्वी मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूँ-
मानव और प्रकृति के बीच के उसी आत्मीय संबंध को व्यक्त करता है, जिसमें शोषण की नहीं, संरक्षण की भावना निहित है। कोई भी पुत्र अपनी माता का विनाश नहीं कर सकता। भारतीय मनीषा ने संभवतः बहुत पहले समझ लिया था कि जिन वस्तुओं के प्रति मनुष्य के भीतर श्रद्धा होगी, उनका विनाश वह सहज रूप से नहीं करेगा। इसलिए नदियों को देवी कहा गया, वृक्षों को देववृक्ष कहा गया, पशुओं को पूज्य माना गया और वनस्पतियों तक में जीवन का स्पंदन अनुभव किया गया।
जैन दर्शन ने तो इस दृष्टि को और भी अधिक व्यापकता प्रदान की। उसने संसार के सूक्ष्मतम जीवन को भी अस्तित्व का सम्माननीय भाग माना। पृथ्वीकायिक, जलकायिक, वायुकायिक और वनस्पतिक जीवों की कल्पना केवल दार्शनिक प्रतीक नहीं थी, बल्कि वह जीवन के प्रत्येक रूप के प्रति संवेदनशीलता का अनुपम उदाहरण थी। जहाँ सामान्य दृष्टि केवल मिट्टी देखती है, वहाँ जैन दृष्टि असंख्य जीवों की उपस्थिति देखती है। जहाँ मनुष्य केवल जल देखता है, वहाँ चेतना की सूक्ष्म तरंगों का संसार विद्यमान माना जाता है। यही कारण है कि अहिंसा केवल सामाजिक व्यवहार का सिद्धांत नहीं रही, बल्कि पर्यावरणीय अनुशासन का भी आधार बनी।
भारतीय संस्कृति की “कण-कण में भगवान” की अवधारणा वस्तुतः पर्यावरणीय नैतिकता की सबसे सुंदर अभिव्यक्ति है। यदि प्रत्येक कण में ईश्वर का अंश है, यदि प्रत्येक जीव में परमात्मा बनने की संभावना है, यदि प्रत्येक स्थान किसी न किसी तप, साधना या चेतना का स्पर्श पा चुका है, तब इस सृष्टि का कोई भी अंश तिरस्कार योग्य कैसे हो सकता है? तब वृक्ष काटना केवल लकड़ी काटना नहीं रह जाता, वह जीवन की संभावना पर प्रहार बन जाता है। नदी को प्रदूषित करना केवल जल को गंदा करना नहीं रह जाता, वह अस्तित्व की धारा को विषाक्त करना बन जाता है।
वर्तमान समय की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि मनुष्य ने प्रकृति के साथ संबंध खो दिया है। आधुनिक सभ्यता ने मनुष्य को सुविधाएँ तो दीं, किंतु संवेदनाएँ छीन लीं। मशीनों ने गति दी, परंतु मन की शांति छीन ली। महानगरों की चमक ने तारों भरे आकाश को निगल लिया। विकास की अट्टालिकाओं ने वृक्षों की हरियाली को विस्थापित कर दिया। परिणामस्वरूप पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है, ऋतुओं का संतुलन बिगड़ रहा है, जैव विविधता समाप्त हो रही है और मनुष्य स्वयं अपने अस्तित्व के संकट के सामने खड़ा है।
आज आवश्यकता केवल पर्यावरणीय कानूनों की नहीं है; आवश्यकता पर्यावरणीय संस्कारों की है। कानून भय पैदा कर सकते हैं, किंतु संरक्षण का स्थायी भाव केवल संस्कृति ही उत्पन्न कर सकती है। यदि बचपन से ही मनुष्य को यह सिखाया जाए कि वृक्ष केवल ऑक्सीजन के स्रोत नहीं, बल्कि जीवन के सहचर हैं; नदियाँ केवल जलस्रोत नहीं, बल्कि सभ्यता की धमनियाँ हैं; पृथ्वी केवल भूमि नहीं, बल्कि जीवनदायिनी माता हैकृतो पर्यावरण संरक्षण कोई सरकारी अभियान नहीं रहेगा, बल्कि जीवन का स्वाभाविक आचरण बन जाएगा।
समाधान बाहरी व्यवस्थाओं से पहले भीतर की चेतना में परिवर्तन से आरंभ होगा। हमें पुनः उस सांस्कृतिक दृष्टि की ओर लौटना होगा जहाँ प्रकृति के प्रति श्रद्धा थी। वृक्षारोपण केवल औपचारिक कार्यक्रम न रहे, बल्कि जीवन का उत्सव बने। जल संरक्षण केवल नारा न रहे, बल्कि सामाजिक अनुशासन बने। धार्मिक अनुष्ठानों को भी पर्यावरण-सम्मत स्वरूप दिया जाए। नदियों को श्रद्धा से पूजने के साथ-साथ उन्हें प्रदूषण से मुक्त रखना भी धार्मिक कर्तव्य माना जाए। नगरों के विस्तार के साथ-साथ हरित क्षेत्र अनिवार्य हों। विद्यालयों में पर्यावरण केवल विषय न रहे, बल्कि संस्कार बने।
यह भी आवश्यक है कि हम उपभोग की अंधी संस्कृति से बाहर निकलें। प्रकृति की सबसे बड़ी शत्रु मनुष्य की अतृप्त इच्छाएँ हैं। भारतीय दर्शन का अपरिग्रह सिद्धांत आज के पर्यावरण संकट का अत्यंत प्रभावी समाधान प्रस्तुत करता है। जितनी आवश्यकता हो उतना ही उपभोग, जितना चाहिए उतना ही संग्रह और जितना संभव हो उतना संरक्षणकृयदि यह जीवनशैली बन जाए तो पृथ्वी पर पड़ने वाला असंतुलित दबाव स्वतः कम हो सकता है।
विश्व पर्यावरण दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं होना चाहिए; यह आत्ममंथन का दिवस होना चाहिए। यह दिन हमें स्मरण कराए कि यदि पृथ्वी सुरक्षित नहीं रहेगी तो कोई भी प्रगति अर्थपूर्ण नहीं रह जाएगी। मानव सभ्यता का भविष्य तकनीकी चमत्कारों से अधिक प्रकृति के संतुलन पर निर्भर है। हमें यह समझना होगा कि पृथ्वी हमारे पूर्वजों की संपत्ति नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की धरोहर है, जिसे हमने केवल कुछ समय के लिए संरक्षण हेतु प्राप्त किया है।
भारतीय संस्कृति की प्राचीन दृष्टि आज भी हमें यही सिखाती है कि प्रकृति पर अधिकार नहीं, उसके साथ सह-अस्तित्व ही मानवता का वास्तविक पथ है। जब मनुष्य पुनः यह अनुभव करने लगेगा कि वायु में जीवन का स्पर्श है, जल में चेतना की धारा है, वृक्षों में मौन करुणा है और पृथ्वी के प्रत्येक कण में दिव्यता का अंश विद्यमान है, तभी पर्यावरण संरक्षण केवल नीतियों का विषय नहीं रहेगा, बल्कि मानव हृदय की सहज संवेदना बन जाएगा।
और संभवतः उसी दिन यह पृथ्वी फिर से साँस ले।
पंच भूतों में समाहित, सृष्टि का नव गान है,
चहचहाते नभचरों में, शांति स्वर की तन है।
नदी,पर्वत,पेड़,सगर, जीव,सब सहचर हमारे,
समन्वित हो रहे सारे, आज यह धरती पुकारे।।













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