आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने संत समागम के दौरान धर्म को रागी से बैरागी बनने का मार्ग बताया। प्रथमाचार्य शांतिसागर जी महाराज के अविस्मरणीय योगदानों का गुणानुवाद करते हुए मुनि हितेंद्र सागर जी ने समाज सुधार, जिनालय संरक्षण और गुरुकुल पर प्रकाश डाला। पढ़िए राजेश पंचोलिया की पूरी रिपोर्ट…
आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने कहा कि हमारी आत्मा और परमात्मा की आत्मा समान है। आत्मा से कर्मों को हटाने पर ही जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिल सकती है। संसार के दुख देखकर महापुरुषों को वैराग्य होता है और संत समागम रागी को बैरागी बनाने का माध्यम बनता है। उन्होंने समझाया कि मिथ्यादृष्टि व्यक्ति राग में सुख मानता है जबकि धर्म ही वास्तविक सुख का मार्ग है। प्रवचन में उन्होंने प्रथमाचार्य शांतिसागर जी महाराज के योगदानों को याद करते हुए कहा कि उन्होंने जिनालय संरक्षण, जिनवाणी की रक्षा और सामाजिक कुरीतियों को दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाल विवाह रोकने के लिए शारदा एक्ट बनाने की प्रेरणा भी शांतिसागर जी ने दी।
मुनि श्री हितेंद्र सागर जी ने आचार्य भक्ति के अंतर्गत शांतिसागर जी के जीवन के प्रसंगों का वर्णन किया जिसमें दीक्षा, उपसर्ग सहनशीलता, व्रत, उपवास और समाधि तक के प्रसंग शामिल थे। इस अवसर पर गुरुकुल स्थापनाओं, भक्ति गीत और आचार्य भक्ति ने सभा को भावविभोर कर दिया। जयपुर के चांदसेन परिवार को आचार्य श्री के पाद प्रक्षालन का सौभाग्य प्राप्त हुआ और निर्मोहीमति जी माताजी ने केशलोचन किया। पारसोला, किशनगढ़ और पुणे से आए समाजजनों का सम्मान भी किया गया।













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