भारत वर्षीय दिगंबर जैन महासभा के अंतर्गत संचालित तीर्थ संरक्षिणी महासभा एवं निर्ग्रन्थ सेंटर आफ आर्कियोलॉजी के प्रादेशिक पदाधिकारीगण देवास जिले के प्राचीन जैन ऐतिहासिक तीर्थ गंधर्वपुरी पहुंचकर वहां संग्रहालय में प्रदर्शित प्राचीन प्रतिमाओं का अवलोकन किया। इंदौर से पढ़िए, यह खबर…
इंदौर भारत वर्षीय दिगंबर जैन महासभा के अंतर्गत संचालित तीर्थ संरक्षिणी महासभा एवं निर्ग्रन्थ सेंटर आफ आर्कियोलॉजी के प्रादेशिक पदाधिकारीगण देवास जिले के प्राचीन जैन ऐतिहासिक तीर्थ गंधर्वपुरी पहुंचकर वहां संग्रहालय में प्रदर्शित प्राचीन प्रतिमाओं का अवलोकन किया। नगर में जगह-जगह बिखरे प्राचीन मंदिरों के अवशेष एवं प्रतिमाओं का भी अवलोकन किया। निर्ग्रंथ सेंटर ऑफ आर्कियोलॉजी इंदौर के पुरातत्व संयोजक एवं वर्द्धमानपुर शोध संस्थान के ओम पाटोदी ने बताया कि पदाधिकारी सर्व प्रथम नगर के संकट हरण गंधर्वपुरी पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर में विराजमान प्राचीन जिनबिम्बों के दर्शन किए तत्पश्चात स्थानीय पुरातत्व संग्रहालय पहुंचे। जहां पर नगर एवं आसपास से प्राप्त पुरातत्व सामग्री का अवलोकन किया। यहां पर अधिकांश मूर्तियां खुलें आसमान के नीचे रखी हुई है। वहीं दो विशाल तीर्थंकर प्रतिमाएं नीचे जमीन पर लेटी हुई है। जिस वजह से वे क्षरण को प्राप्त हो रही है एवं अपने मुल स्वरूप को खो रही है। जिन्हें देखकर सभी पदाधिकारियों ने चिंता जताई। नगर के पुरातत्व मामले में रुचि रखने वाले श्री सुरेन्द्र जैन ने नगर एवं प्रतिमाओं के बारे में जानकारी दी। इस अवसर पर महासभा के प्रदेश अध्यक्ष देवेंद्र सेठी एवं कार्याध्यक्ष तल्लीन बड़जात्या, निर्ग्रंथ सेंटर ऑफ आर्कियोलॉजी इंदौर के पुरातत्व संयोजक ओम पाटोदी एवं तीर्थ संरक्षिणी महासभा इंदौर के अध्यक्ष पवन पाटोदी उपस्थित रहे।
राजा गंधर्वसेन (गर्दभिल्ल) की प्राचीन नगरी माना जाता है
इस बारे महासभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष टीके वेद ने बताया कि गंधर्वपुरी के इस पुरातत्व संग्रहालय में सैकड़ों की संख्या में तीर्थंकर प्रतिमाओं और जिन मंदिर के अवशेषों के साथ ही हरिहर, विष्णु, वराह, नटराज, बुद्ध आदि वैदिक देवी-देवताओं की प्रतिमा भी संग्रहित हैं। वहीं पूरे गांव में जगह जगह पुरातत्व सामग्री बिखरी हुई है, यहां के लगभग हर घर में किसी पुराने मंदिर के अवशेष नक्काशी धार पत्थर लगे हुए मिल जाते हैं। जो इस गांव की ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व प्रदर्शित करते है। इस गांव को राजा विक्रमादित्य के पिता राजा गंधर्वसेन (गर्दभिल्ल) की प्राचीन नगरी माना जाता है। यहां की अधिकांश मूर्तियां 10वीं 12वीं शताब्दी है। यहां इतनी बड़ी तादाद में जैन तीर्थंकर प्रतिमाएं भूगर्भ से मिलना इसे प्राचीन जैन धर्म क्षेत्र होने बात को प्रमाणित करते हैं। अपने भारतीय धर्म संस्कृति को देखने के लिए हर व्यक्ति को कम-से-कम एक बार तो इस क्षेत्र की यात्रा करना ही चाहिए। वहीं सरकार को इसे पर्यटन क्षेत्र के रूप में विकसित करना चाहिए ताकि जन साधारण को अपने प्राचीन धरोहर को देखने एवं इतिहास को समझने का अवसर मिले।













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