भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से आयोजित अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी गुरुदेव ने जैन दर्शन के गूढ़ रहस्यों को उजागर करते हुए बताया कि जिनकल्पी साधु चतुर्थ काल में होते थे, जो गुफाओं में रहते थे। बांसवाड़ा से पढ़िए, अजित कोठिया की यह रिपोर्ट…
बांसवाड़ा। भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से आयोजित अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी गुरुदेव ने जैन दर्शन के गूढ़ रहस्यों को उजागर करते हुए बताया कि जिनकल्पी साधु चतुर्थ काल में होते थे, जो गुफाओं में रहते थे। वे अंतरंग और बहिरंग समस्त परिग्रहों से रहित परम वीतरागी होते थे। ये साधु समस्त इच्छाओं से रहित होकर मैत्री, प्रमोद, कारुण्य और माध्यस्थ जैसी चार पवित्र भावनाओं से युक्त होते थे। गुरुदेव ने स्पष्ट किया कि इच्छाओं का निरोध करना ही वास्तविक तप है, जबकि सांसारिक वस्तुओं की कामना करना इच्छा या तृष्णा है। उन्होंने प्रेरणा दी कि इंसान की भावना हमेशा पावन होनी चाहिए और मन में केवल धार्मिक व अच्छे कार्यों को करने की भावना होनी चाहिए, न कि भौतिक तृष्णा या कामना। वर्तमान स्थितियों पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि आज के समय में साधु की समाधि होने पर भी धन की इच्छा के कारण श्रावकों का कई-कई घंटों तक इंतजार किया जाता है, जो कि उचित नहीं है।
सूर्य घड़ी के अनुसार साधु आहारचर्या के लिए उठते हैं
आगे अंतर स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि वर्तमान पंचम काल के स्थविरकल्पी साधु बाह्य तप और त्याग जिनकल्पी साधु की तरह नहीं करते हैं, परंतु उनका अंतरंग तप ठीक उन्हीं की तरह होता है और वे पांच महाव्रतों को पूर्ण रूप से धारण करते हैं। पंचम काल की सीमाओं के कारण अब अधिक उपवास, अधिक विहार, जंगल या गुफा में रहना, आतापन योग करना तथा पर्वत के शिखर पर एक पैर पर खड़े होकर सूर्य के सम्मुख तपस्या करना आदि क्रियाओं के लिए निषेध किया गया है। साधु की दैनिक चर्या के बारे में उन्होंने बताया कि जब बच्चे खाकर खेल लेते हैं और रोगी व वृद्ध भी भोजन कर लेते हैं तथा रसोई से धुआं निकलना पूरी तरह समाप्त हो जाता है, उसके बाद सूर्य घड़ी के अनुसार साधु आहारचर्या के लिए उठते हैं। साधु अपने छह आवश्यक कर्तव्यों का प्रतिदिन कड़ाई से पालन करते हैं और भूमि पर ही शयन करते हैं। समाधिस्थ साधु की देखरेख के बारे में उन्होंने कहा कि आचार्य स्वयं ऐसे साधु के लिए अनुकूल व्यवस्था करते हैं, जिसके तहत गर्मी की ऋतु में शीत व्यवस्था तथा शीत ऋतु में उष्ण व्यवस्था की जाती है।
आत्मरक्षा से ही वास्तव में पर-जीवों की रक्षा संभव
गुरुदेव ने जोर देकर कहा कि जैन शासन वास्तव में आत्मानुशासन है और जो स्वयं को अनुशासित करने के योग्य होता है, वही सच्चा शिष्य कहलाता है। अहिंसा के सिद्धांत को समझाते हुए उन्होंने कहा कि साधु का नियम है कि पहले स्वरक्षा करो और फिर दूसरों की रक्षा करो। श्रावक की प्रत्येक व्यावहारिक क्रिया में अनिवार्य रूप से जीव मरते हैं, इसलिए संसार के सभी जीवों की रक्षा कोई भी अकेला व्यक्ति नहीं कर सकता। आत्मरक्षा से ही वास्तव में पर-जीवों की रक्षा संभव होती है, क्योंकि जहां आत्मा के परिणामों की हिंसा (भाव हिंसा) होती है, वहां सभी प्रकार की हिंसा स्वतः हो जाती है। अंत में, उन्होंने व्यावसायिक स्तर पर होने वाली क्रूरता पर प्रहार करते हुए कहा कि आज मुर्गी पालन और मत्स्य पालन के नाम पर जीवों की सबसे अधिक हिंसा की जा रही है, जहां जीवों का मांस खाने के लिए पहले उन्हें अच्छा खिलाया-पिलाया जाता है और बाद में बेरहमी से उनकी हिंसा कर दी जाती है। मुनिश्री सुविज्ञ सागर जी ने आचार्य श्री द्वारा रचित ‘धन्य हो गुरुवार धन्य हो तुम कितनी समता रखते हो।’ कविता द्वारा मंगलाचरण किया। यह जानकारी विजयलक्ष्मी गोदावत सागवाड़ा ने दी।













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