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अक्षय तृतीया एवं परशुराम जयंती 19 अप्रैल को : तीर्थंकर ऋषभदेव आहार दिवस मनाया जाएगा 


अक्षय का अर्थ पूर्णता से है, न तो वो मिटता है, न हटता है, न ही बिखरता है अर्थात पूर्ण फल प्राप्ति होती हैं। ऐसी तिथि वर्ष में केवल एक बार ही आती है। उसे अक्षय तृतीया के नाम से जाना जाता है। वरिष्ठ ज्योतिषाचार्य डॉ. हुकुमचंद जैन ने बताया कि वैशाख माह शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को ही अक्षय तृतीया तिथि नाम से जाना जाता है। मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर…


मुरैना। अक्षय का अर्थ पूर्णता से है, न तो वो मिटता है, न हटता है, न ही बिखरता है अर्थात पूर्ण फल प्राप्ति होती हैं। ऐसी तिथि वर्ष में केवल एक बार ही आती है। उसे अक्षय तृतीया के नाम से जाना जाता है। वरिष्ठ ज्योतिषाचार्य डॉ. हुकुमचंद जैन ने बताया कि वैशाख माह शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को ही अक्षय तृतीया तिथि नाम से जाना जाता है। यह इस बार 19 अप्रैल रविवार के दिन है। इस बार तृतीया तिथि का प्रारंभ 19 अप्रैल को सुबह 10.49 बजे होगा। इसका समापन 20 अप्रैल को प्रातः 7.27 बजे होगा। इसी दिन परशुराम जयंती एवं जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभ देव जी का आहार दिवस भी पारंपरिक श्रद्धा और भक्ति से मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि श्री परशुराम जी का जन्म प्रदोष काल में वैशाख तृतीया तिथि में हुआ था। प्रदोष काल युक्त तृतीया 19 अप्रैल रविवार को ही है। अक्षय तृतीया का पूजा मुहूर्त इस बार रविवार सुबह 10.49 से प्रारंभ होकर 12.20 बजे तक रहेगा।

जैन ने बताया कि इस दिन का किया हुआ तप, दान अक्षय फलदायक होता हैं। वैदिक ज्योतिष में भी अक्षय तृतीया को सभी अशुभ प्रभावों से मुक्त एक शुभ दिन मानते हैं। पंचांग के अनुसार विवाह, गृह प्रवेश, भूमि पूजन, वाहन, प्रॉपर्टी, मकान, सोना, चांदी आदि खरीदने के लिए इस दिन किसी प्रकार के मुहूर्त की जरूरत नहीं होती। इस लिए किसी भी कार्य के आरंभ के लिए यह दिन अबूझ मुहूर्त कहलाता है अर्थात किसी से पंचांग से मुहूर्त पूछ ने की जरूरत नहीं होती।

अक्षय तृतीया पर दान का अक्षय महत्व 

अक्षय तृतीया को पंखा, चावल, नमक, घी, चीनी, सब्जी, फल, इमली एवं वस्त्रों का वृतार्थी को दान अवश्य करना चाहिए। इस दिन बद्रीनाथ मंदिर के पट भी खुलते हैं। कुछ श्रद्धालु इस दिन पवित्र नदी या गंगा जी में स्नान करके गेहूं, चने, सत्तू, दही-चावल, गन्ने का रस, मिष्ठान्न आदि दान करते हैं। जैन धर्म में भी अक्षय तृतीया का विशेष महत्व है। जैन शास्त्रों के अनुसार जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभ देव जी को दीक्षा लेने के बाद 6 माह तक नवधा भक्तिपूर्वक आहार की विधि नहीं मिल सकी थी। तब हस्तिनापुर के राजा श्रेयांश को रात्रि स्वप्न आया तब राजा श्रेयांश कुमार ने गन्ने के रस का प्रथम आहार वैशाख शुक्ल तृतीया के दिन भगवान ऋषभ देव जी को इसी दिन दिया था। तब से इस दिन को जैन धर्मावलंबी बड़े धूमधाम से मनाते हैं।

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