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अहंकार और वहम से दूर रहना ही धर्म का मार्ग: क्षुल्लक महोदय सागर : पर्यूषण पर्व के तीसरे दिन उत्तम आर्जव धर्म पर हुआ प्रवचन


धरियावद स्थित श्री चंद्रप्रभु दिगंबर जैन मंदिर में पर्यूषण पर्व के तीसरे दिन क्षुल्लक 105 श्री महोदय सागर जी महाराज ने श्रद्धालुओं को अहंकार और वहम से दूर रहने की प्रेरणा दी। उन्होंने बताया कि ‘इगो’ को दूर करने से ही धर्म की प्राप्ति संभव है और नम्रता एवं सरलता व्यक्ति को धर्म के पथ पर ले जाती है। पढ़िए पूरी रिपोर्ट…


धरियावद। नगर के श्री चंद्रप्रभ दिगंबर जैन मंदिर में विराजित क्षुल्लक 105 श्री महोदय सागर जी महाराज ने पर्वराज पर्यूषण के तीसरे दिन उत्तम आर्जव दिवस पर श्रद्धालुओं को धर्म की महत्ता समझाते हुए अहंकार को दूर रखने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि पर्व हमारे जीवन में परिवर्तन लाते हैं और हमारी आत्मा को परमात्मा से जोड़ते हैं।

क्षमा रूपी भूमि पर जब नम्रता का बीज गिरता है, तो वह सरलता से पुष्पित और फलित होता है। उन्होंने बताया कि पर्यूषण पर्व के प्रथम दिन क्रोध से बचने का प्रयास करने से जीवन में सरलता और शांति आती है।

अहंकार समस्त विपदाओं की जड़

महोदय सागर जी ने कहा कि अहंकार समस्त विपदाओं की जड़ है। ‘इगो’ को दूर करने पर ही हमारी आत्मा में धर्म प्रवेश कर सकता है। अभिमान की शक्ति फरिश्तों को भी शैतान बना देती है, जबकि नम्रता और सरलता साधारण व्यक्ति को भी श्रेष्ठ बना देती है।

क्षुल्लकजी ने विशेष रूप से यह बताया कि व्यक्ति को केवल दो शब्द नष्ट करते हैं—अहम और वहम। “I am something” यानी मैं कुछ हूं ने हमारे जीवन में अहंकार का अंधकार भर दिया है। जब मन में दूसरों के गुण सहन करने की क्षमता समाप्त हो जाए, या दूसरों को नीचा दिखाने या ईर्ष्या का भाव उत्पन्न हो, तब समझ लेना चाहिए कि अहंकार के विष ने व्यक्ति को प्रभावित किया है। इस अवसर पर उपस्थित श्रद्धालुओं ने महोदय सागर जी के प्रवचन को बड़े श्रद्धा एवं भक्ति भाव से सुना और जीवन में अहंकार और वहम को दूर कर धर्म के पथ पर चलने का संकल्प लिया।

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