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मुनि श्री सुधासागर जी महाराज ने कर्म कर कमाने के मार्ग बताए: मुनिश्री के प्रवचनों में श्रद्धालुओं को मिल रही धर्म की प्रेरणा


मुनिश्री सुधासागर जी के प्रवचन रोज चल रहे हैं और वे धर्मसभा में जैन समाज को कर्म, धर्म और संयम की परिभाषा से अवगत करवा रहे हैं। धर्म सभा में दी गई देशना से श्रद्धालुजन पुण्य कमा रहे हैं। कटनी से पढ़िए, राजीव सिंघई मोनू की यह खबर…


कटनी। सवाल यह नहीं है कि तुम्हारा खर्च कितना है। सवाल यह है कि तुम्हारी कमाई कितनी है? व्यक्ति इसलिए पतित नहीं होता है कि वह गलत कार्य करता है, इसलिए दुःख नहीं उठाता है कि उससे कुछ गलत हो जाता है, इसलिए संसारिक दृष्टि से व्यक्ति दुःख उठाता है कि वह अच्छा कितना करता है? जितनी भावनाएं तुम्हारी खर्च करने की होती हैं, उतना दिमाग यदि कमाई पर लगा लो तो तुम्हारी सारी इच्छाएं पूरी हो जाएगी। व्यक्ति कमाई करने में जी चुराता है। हमें भगवान को देखकर कर भगवान बनने का मन ललचता है, इतना विकल्प, इतना टेंशन, भगवान ने जो साधना की है, वह साधना कर ले तो तो भगवान बनाना नहीं पड़ेगा, अपने आप बन जाएगा।

भगवान की साधना से ललचाओ, भगवान के पद से नहीं। जो भगवान से आकर्षित होते हैं वे कभी भगवान नहीं बनते हैं और जो भगवान की साधना से आकर्षित होते हैं, वे भगवान बने बिना नहीं रहते हैं। तुम्हारा मन महान आत्माओं की साधना से आकर्षित हो जाए, समझना तुम्हारा भविष्य बहुत उज्जवल है।

व्यभिचारी की कोई जिम्मेदारी नहीं

ज्ञानी व्यक्ति सेठ को देखकर उनके पैसे से नहीं ललचाता, वह सोचता है कि इन्होंने किस विधि से पैसा कमाया। वो उनसे हुनर सीखेगा। वह सेठ की कमाई को नहीं लूटेगा, सेठ के कमाने की विधि को सीखेगा। बिना कमाए यदि किसी के धन पर हमारी नियत खराब होती है, समझ लेना इसी का नाम डाकू है। जब-जब दूसरे की वस्तु पर तुमने उसे कमाया नहीं, बनाया नहीं, खिलाया नहीं, कुछ नहीं किया, मात्र उसे पाने का भाव आ रहा है। इसी का नाम है डाकू। हम कुछ नहीं करना चाहते, बस यह वस्तु मुझे चाहिए, चाहे धन, दौलत, परिवार, चाहे स्त्री हो, चाहे पुरुष हो। तुमने उस स्त्री से न विवाह किया, न पालन किया, न खिलाते-पिलाते हो, न खर्च उठाते हो, फिर भी दूसरे की स्त्री पर नियत खराब करते हो, इसी का नाम है डाकू।

पति को इतना दोष नहीं आता क्योंकि, वो उसकी रक्षा करता है, उसका खर्चा भी उठाता है, उसका पालन भी करता है, तब वो उसको ग्रहण करता है लेकिन, व्यभिचारी की कोई जिम्मेदारी नहीं, उसको मात्र पाप करना है। इंद्रियों के विषयों का सेवन करना इतना बड़ा पाप नहीं है लेकिन, जिम्मेदारियों से भागकर के पाप करना ये महापाप कहलाता है, इसको बोलते है व्यभिचार। अपने मन को संभालो यदि तुम्हारे पाप करने का भाव है तो पाप की जिम्मेदारी को भी संभालो। उसका फल मिलेगा तो उसको स्वीकार करो, उसकी भी सुरक्षा करो।

दो बातें ध्यान कर लेना…

धनवान व्यक्ति ने कैसे धन कमाया होगा, कितनी मेहनत की होगी, कितना इन्वेस्ट किया होगा, अपनी संपत्ति भेजी होगी, शायद लोन भी लिया होगा, दिन रात मेहनत की होगी तब जाकर दो पांच लाख रुपया वो कमा पाया और तुमने उसको उठाने का, मारने का भाव कर लिया, जाओ महानुभाव तुम कितनी भी चोरी कर लेना, तुम्हारी जिंदगी में ऐसे कर्म का बंध होगा, कल तुम भीख भी मांगोगे तो नहीं मिलेगी, जितने ये भिखारी है, यह पूर्ण भव के डकैत हैं। अनेक कारणों में एक कारण यह भी है। दो बातें ध्यान कर लेना जो वस्तु हमें चाहिए है, वह वस्तु जिसके भी पास है, उससे कभी ईष्या नहीं करेंगे, उसको नुकसान नहीं पहंुचाएंगे। दूसरा वस्तु जो मुझे चाहिए है, वो किसी दूसरे के पास है, हम उस पर नियत खराब नहीं करेंगे।

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