विश्व तंबाकू निषेध दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि तंबाकू का त्याग केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं, बल्कि एक स्वस्थ समाज और सशक्त राष्ट्र के निर्माण की दिशा में उठाया गया महत्वपूर्ण कदम है। आज पढ़िए, सुनील सुधाकर शास्त्री द्रोणगिरि/सागर का यह आलेख…
तंबाकू चुने या खुशहाल जिंदगी ” यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि वर्तमान समय की सबसे बड़ी सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी आवश्यकता है। विडंबना यह है कि जिस पदार्थ को मनुष्य क्षणिक आनंद, तनाव से मुक्ति अथवा शौक के नाम पर अपनाता है, वही धीरे-धीरे उसके जीवन, स्वास्थ्य, परिवार और भविष्य को निगल जाता है। विश्व तंबाकू निषेध दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि तंबाकू का त्याग केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं, बल्कि एक स्वस्थ समाज और सशक्त राष्ट्र के निर्माण की दिशा में उठाया गया महत्वपूर्ण कदम है।
आज तंबाकू विश्व की उन घातक बुराइयों में से एक है जो हर वर्ष लाखों लोगों की असमय मृत्यु का कारण बनती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार विश्वभर में प्रतिवर्ष लगभग 80 लाख से अधिक लोगों की मृत्यु तंबाकू सेवन और उसके दुष्प्रभावों के कारण होती है। भारत में भी प्रतिवर्ष लाखों लोग तंबाकू जनित बीमारियों के कारण काल के गाल में समा जाते हैं। यह मृत्यु केवल किसी व्यक्ति की नहीं होती, बल्कि उसके साथ एक परिवार के सपने, आशाएँ और भविष्य भी समाप्त हो जाते हैं।
तंबाकू का सेवन शरीर के लगभग प्रत्येक अंग को प्रभावित करता है। मुख कैंसर, गले का कैंसर, फेफड़ों का कैंसर, हृदय रोग, उच्च रक्तचाप, पक्षाघात, दमा, क्षय रोग, दंत रोग, मसूड़ों की समस्याएँ तथा श्वसन तंत्र से जुड़ी अनेक बीमारियाँ तंबाकू की देन हैं। विशेष चिंता का विषय यह है कि भारत में मुख कैंसर के अधिकांश मामलों के पीछे गुटखा, खैनी, जर्दा और अन्य धूम्ररहित तंबाकू उत्पादों का सेवन प्रमुख कारण है। तंबाकू केवल जीवन को छोटा नहीं करता, बल्कि उसे पीड़ा, निर्भरता और असहायता से भर देता है।
तंबाकू की लत का दुष्परिणाम केवल सेवन करने वाले व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। अनेक परिवार आर्थिक, सामाजिक और भावनात्मक रूप से इसके कारण बर्बाद हो रहे हैं। घर की आय का एक बड़ा हिस्सा तंबाकू और उससे उत्पन्न रोगों के उपचार पर व्यय हो जाता है। जब परिवार का कमाने वाला सदस्य गंभीर बीमारी का शिकार होता है, तब पूरे परिवार पर संकट का पहाड़ टूट पड़ता है। बच्चों की शिक्षा प्रभावित होती है, घरेलू आवश्यकताएँ अधूरी रह जाती हैं और परिवार गरीबी तथा मानसिक तनाव के दुष्चक्र में फँस जाता है। एक छोटी-सी आदत कई बार पूरे परिवार के सुख-चैन को छीन लेती है।
और भी चिंताजनक स्थिति यह है कि तंबाकू की लत अब वयस्कों तक सीमित नहीं रही। विद्यालयी आयु के बच्चे और किशोर भी इसकी गिरफ्त में आते जा रहे हैं। मित्रों का प्रभाव, दिखावा, जिज्ञासा, सोशल मीडिया और आसपास का वातावरण बच्चों को तंबाकू सेवन की ओर आकर्षित कर रहा है। स्कूलों के आसपास गुटखा, पान मसाला और तंबाकू उत्पादों की सहज उपलब्धता इस समस्या को और गंभीर बना रही है। जो हाथ पुस्तकों और कलम को थामने चाहिए, वे कई बार तंबाकू के पाउच पकड़ते दिखाई देते हैं। यह केवल बच्चों के स्वास्थ्य के लिए ही नहीं, बल्कि राष्ट्र के भविष्य के लिए भी गंभीर खतरा है।
दुर्भाग्यवश तंबाकू नियंत्रण के प्रयासों के बीच अनेक विरोधाभास भी दिखाई देते हैं। एक ओर तंबाकू उत्पादों पर चेतावनी संदेश अंकित किए जाते हैं, दूसरी ओर कानूनी प्रावधानों की कमियों और व्यावसायिक रणनीतियों का लाभ उठाकर गुटखा एवं पान मसाला कंपनियाँ अपने उत्पादों का अप्रत्यक्ष प्रचार करती रहती हैं। गुटखा प्रतिबंधित होने के बावजूद पान मसाला और तंबाकू के अलग-अलग पाउच बाजार में खुलेआम उपलब्ध हैं, जिन्हें उपभोक्ता मिलाकर उसी प्रकार सेवन करते हैं जैसे गुटखा। यह व्यवस्था कानून की भावना को चुनौती देती प्रतीत होती है। कर राजस्व और आर्थिक हितों के कारण भी तंबाकू के पूर्ण उन्मूलन की दिशा में अपेक्षित कठोरता दिखाई नहीं देती। परिणामस्वरूप तंबाकू उद्योग नए-नए रूपों में समाज तक अपनी पहुँच बनाए रखने में सफल हो जाता है।
इस समस्या का समाधान केवल सरकारी नियमों और दंडात्मक प्रावधानों से संभव नहीं है। इसके लिए व्यापक सामाजिक जागरूकता की आवश्यकता है। समाज को यह समझना होगा कि तंबाकू कोई व्यक्तिगत पसंद मात्र नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य का प्रश्न है। सामाजिक संस्थाओं, स्वयंसेवी संगठनों, धार्मिक मंचों और जनप्रतिनिधियों को इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभानी होगी। तंबाकू सेवन को सामाजिक प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि सामाजिक बुराई के रूप में स्थापित करना समय की मांग है।
विद्यालय इस परिवर्तन के सबसे प्रभावी केंद्र बन सकते हैं। बच्चों को प्रारंभिक अवस्था से ही तंबाकू के दुष्परिणामों की वैज्ञानिक एवं नैतिक जानकारी दी जानी चाहिए। नियमित जागरूकता कार्यक्रम, निबंध, वाद-विवाद, शपथ ग्रहण और परामर्श सत्र विद्यार्थियों में सकारात्मक सोच विकसित कर सकते हैं। यदि विद्यालय बच्चों को तंबाकू के प्रति सजग बना दें, तो आने वाली पीढ़ियाँ इस अभिशाप से काफी हद तक मुक्त हो सकती हैं।
इसके साथ ही माता-पिता की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। बच्चे वही सीखते हैं जो वे अपने घर में देखते हैं। यदि अभिभावक स्वयं तंबाकू का सेवन करते हैं, तो बच्चों को उससे दूर रहने की सीख प्रभावी नहीं हो सकती। इसलिए आवश्यक है कि माता-पिता पहले स्वयं तंबाकू मुक्त जीवन अपनाएँ, फिर बच्चों की संगति, व्यवहार और आदतों पर सतत निगरानी रखें। प्रेम, संवाद और मार्गदर्शन के माध्यम से बच्चों को स्वस्थ जीवनशैली की ओर प्रेरित करना प्रत्येक अभिभावक का दायित्व है।
विश्व तंबाकू निषेध दिवस हमें केवल चेतावनी नहीं देता, बल्कि एक अवसर भी प्रदान करता है—स्वयं को, अपने परिवार को और अपने समाज को एक घातक लत से मुक्त कराने का अवसर। जीवन का वास्तविक आनंद किसी नशे में नहीं, बल्कि स्वस्थ शरीर, प्रसन्न मन और खुशहाल परिवार में निहित है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम तंबाकू को नहीं, जीवन को चुनें; व्यसन को नहीं, स्वास्थ्य को अपनाएँ; क्षणिक सुख को नहीं, स्थायी खुशहाली को प्राथमिकता दें। जब प्रत्येक नागरिक यह संकल्प लेगा कि वह स्वयं तंबाकू से दूर रहेगा और दूसरों को भी इसके दुष्परिणामों से अवगत कराएगा, तभी एक स्वस्थ, जागरूक और समृद्ध भारत का सपना साकार हो सकेगा। तंबाकू का त्याग ही खुशहाल जिंदगी की सबसे सशक्त कुंजी है।
दुष्टता से प्यार करना छोड़ दो,
नशे का व्यापार करना छोड़ दो।
जिंदगी का एक पल भी कीमती,
मौत से संवाद करना छोड़ दो।।













Add Comment