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परिवार, समाज संसार में शांति का आधार सहनशीलता : आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का जोबनेर की ओर जारी है विहार, बेगस में दी धर्म देशना


प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी महा मुनिराज की मूल बालब्रह्मचारी पट्ट परंपरा के पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ससंघ 37 पिच्छिका का मंगल विहार जोबनेर की ओर चल रहा है। जयपुर से पढ़िए, डॉ. राजेश पंचोलिया की यह खबर…


जयपुर। प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी महा मुनिराज की मूल बालब्रह्मचारी पट्ट परंपरा के पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ससंघ 37 पिच्छिका का मंगल विहार जोबनेर की ओर चल रहा है। शनिवार को को प्रातः विहार 5.15 बजे से 5.6 किमी दिगंबर जैन मंदिर बेगस से राजकीय स्कूल चक बेगस में हुआ। श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर, बेगस में आहार और रात्रि विश्राम हुआ।

यदि सही दिशा में पुरुषार्थ करें तो परमात्मा बन सकते हैं

आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने शुक्रवार को बेगस पहुंचकर धर्मसभा में भगवान महावीर के बारे में सरल, भावपूर्ण एवं सार में बताया। उन्होंने कहा कि भगवान महावीर केवल 24वें तीर्थंकर नहीं हैं, बल्कि वर्तमान काल में धर्म के प्रकाश स्तंभ हैं। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि साधारण जीव भी यदि सही दिशा में पुरुषार्थ करे तो परमात्मा बन सकता है।जब भगवान का जन्म हुआ, तब राज्य में सुख, शांति, धन-धान्य और समृद्धि बढ़ने लगी। इसलिए उनका नाम “वर्धमान” रखा गया। जब सदगुण धर्म और पुण्य बढ़ते हैं, वहां वास्तविक समृद्धि आती है।

सच्चा वीर वह नहीं जो दूसरों को हराए

आचार्य श्री ने कहा कि भगवान महावीर की बुद्धि तीव्र होने से बड़े-बड़े ज्ञानी उनकी प्रतिभा देखकर चकित रह जाते थे। इसलिए उन्हें “सम्मति” कहा गया। जब मदमस्त हाथी सामने आया, तब वे नहीं डरे; इसलिए “अतिवीर” कहलाए। भयंकर सर्प के सामने भी अडिग रहे, तब देवों ने उन्हें “महावीर” नाम दिया। सच्चा वीर वह नहीं जो दूसरों को हराए, बल्कि वह है जो अपने भय, क्रोध और अहंकार को जीत ले।

तपस्या से ही आत्मा का तेज प्रकट होता है

व्यक्ति की पहचान उसके रूप से नहीं, उसके गुणों से होती है।राजमहल, संपत्ति, सम्मान और सुख-सुविधाओं के बीच रहते हुए भी भगवान महावीर ने संसार की असारता को समझ लिया। 30 वर्ष की आयु में उन्होंने सब कुछ छोड़कर दीक्षा ग्रहण कर ली। त्याग वस्तुओं का नहीं, आसक्ति का करना होता है। तपस्या से ही आत्मा का तेज प्रकट होता है। भगवान ने 12 वर्षों तक कठिन तप और साधना की। अनेक कष्ट आए, उपसर्ग आए, लेकिन वे कभी विचलित नहीं हुए। उन्होंने केवल उपदेश नहीं दिए, बल्कि अपना पूरा जीवन धर्म का उदाहरण बनाकर दिखाया।

मंदिरों से पहले अपने मन को पवित्र बनाना होगा

उन्होंने पाँच महाव्रतों अहिंसा,सत्य,अचौर्,ब्रह्मचर्य ओर अपरिग्रह का संदेश दिया डा राजेश पंचोलिया,श्री सुरेश सबलावत के अनुसार आचार्य श्री ने आगे बताया कि भगवान महावीर ने अनेकांत के सिद्धांत में सिखाया कि हर बात को एक ही दृष्टि से नहीं देखना चाहिए। दूसरों के विचारों को भी समझने का प्रयास करना चाहिए। परिवार, समाज और संसार में शांति का आधार सहनशीलता है जिस दिन भगवान ने मोक्ष प्राप्त किया, उसी दिन गौतम स्वामी को केवलज्ञान प्राप्त हुआ। यदि धर्म को बचाना है, तो मंदिरों से पहले अपने मन को पवित्र बनाना होगा। धर्म की रक्षा शास्त्र पढ़ने के साथ ,शास्त्र के अनुसार जीने से होती है।

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