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भाव मन बिना द्रव्य मन कोई काम नहीं करता: धर्माचार्य श्री कनक नंदीजी ने बताए भावना योग के बारे महत्वपूर्ण तत्व


धर्माचार्य कनक नदी गुरुदेव ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कि आत्मा की कई धाराएं हैं। जिसमें आत्मविश्वास आत्म श्रद्धा आत्मज्ञान आदि हैं। पढ़िए, अजीत कोठिया की रिपोर्ट…


 डडूका। धर्माचार्य कनक नदी गुरुदेव ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कि आत्मा की कई धाराएं हैं। जिसमें आत्मविश्वास आत्म श्रद्धा आत्मज्ञान आदि हैं। भाव मन बिना द्रव्य मन कोई काम नहीं करता। जो स्वयं को शरीर मानता है, मैं काला हूं, मैं गौरा हूं, मैं गरीब हूं मैं धनी हूं मानता है वह मिथ्या दृष्टि है। वचन को मन को भी मैं मानना कुज्ञान है।

सिद्ध अर्थात शुद्ध आत्मा का वर्णन सिद्ध चक्र मंडल विधान में किया गया है। एक बार भी आत्म श्रद्धा होना दुर्लभ है। प्रिय तथा श्रेय में अंतर बताते हुए आचार्य श्री ने कहा की भोग उपभोग प्रिय है श्रेय नहीं।

 आत्मा को परमात्मा बनाना श्रेय है।

मोह के कारण अनादि काल से जीव निगोद में सुषुप्त रहता है। मनुष्य पर्याय प्राप्त करके भी मोह के कारण पुत्र आदि में आसक्त रहता है। सबसे महान पाप मोह है। सप्त व्यसन,पंच पाप नहीं करने वाला भी मोह के कारण अनेक पाप करते हैं। जो पाप मिथ्या दृष्टि देव बांधता है वही पाप मिथ्या दृष्टि नारकी बाधँता है तथा मिथ्या दृष्टि पशु पक्षी भी वही पाप बांधते हैं वही पाप मिथ्या दृष्टि मनुष्य भी बाधँता है। अतः आचार्य श्री राजा महाराजा पशु पक्षी देव नारकी सभी को गुणस्थान के अनुसार समान मानते हैं। अतः सन्यक दर्शन आत्मा का श्रेष्ठतम गुण है। पुण्य से भोग भूमि में तो जन्म हो जाता है परंतु सम्यक दर्शन के लिए पुण्य के साथ अनेक कारण चाहिए।

मिथ्या दृष्टि गुरु के हितोपदेश को भी नहीं सुनते

शरीर को मैं मानना मिथ्यात्व है। शरीर को पर रूप अनात्मा माने ऐसे जीव ही आत्मा से परमात्मा बनते हैं। अज्ञानी मोही जीव आत्म तत्व का उपदेश सुनने पर भी सही नहीं मानते हैं। आकाश आग से नहीं जलता, जलाने पर भी नहीं जलता नहीं जलाने पर भी नहीं जलता है। इस प्रकार आत्मा के एक भी प्रदेश को कोई जला नहीं सकता। स्वयं को ज्ञानी मानने वाले मिथ्या दृष्टि गुरु के हितोपदेश को भी नहीं सुनते। गुरु को अज्ञानी मानकर और पाप बाँध देते हैं। गुरुदेव कहते हैं प्रारंभिक अवस्था में मिथ्या दृष्टि अवस्था में ऐसा ही होता है महापुरुषों ने भी मिथ्या्त्व अवस्था में अपने गुरु को अपने हितेषी को गलत ही माना। जैसे मरीचि कुमार। जब पुण्य उदय आता है निकट भव्य होता है तभी गुरु उपदेश समझ में आता है सम्यक आचरण कर पाता है।

छोटे बच्चे भी स्वयं को ज्ञानी मानते हैं हम सीखाते हैं तो मुझे सब आता है ऐसा बोलते हैं यह सब पूर्व संस्कार वश होता है।

आचार्य श्री को ही नहीं सभी महापुरुषों को भी सामान्य लोग गलत ही समझते हैं। क्योंकि साधुओं की अलौकिक वृत्ति होती है। सामान्य लोगो से उनकी क्रियाएं, उनके विचार विपरीत होते हैं बहुत उच्च होते हैं जो सामान्य लोग समझ नहीं पाते हैं।

अच्छे गुणो की कोई हंसी उड़ाएं तो परवाह नहीं करनी चाहिए। चतुर्थ काल में पंचम काल में भी महापुरुषों को सामान्य लोग समझ नहीं पाते हैं। आदिनाथ भगवान को उनके पोते मरीचि कुमार ने उन्हें गलत माना इसमें भगवान का कोई दोष नहीं स्वयं मरीचि कुमार के पाप कर्म का उदय था। अनेको भव कष्ट सहने के बाद पुण्य कर्म के उदय से शेर की पर्याय में भी साधु का उपदेश सुना समझा आचरण में लाया सम्यक दृष्टि बना तथा अगले भव में महावीर बना। मुनिश्री सुदत्त सागर जी की जिज्ञासा थी कि आचार्य श्री छोटे बच्चों से लेकर बड़ों को सामान्य लोगों को भी, पापी लोगों को भी धन्यवाद देते हैं थैंक यू बोलते हैं तो इसमें आचार्य श्री को पाप नहीं लगेगा। ऐसी जिज्ञासा का समाधान करते हुए आचार्य श्री कनक नदी गुरुदेव ने बताया कि हमारे पूर्वआचार्यो ने आगम में मेंढक को भी महानुभाव महात्मा आदि शब्दों से संबोधन किया है।

 चांडाल को भी पापक्षयरस्तु, पुण्य वृद्धिरस्तु का आशीर्वाद दिया 

पापी लोगों को ही आशीर्वाद की अधिक आवश्यकता होती है। णमो लोए सव्वसाहुणं मे वर्तमान में नरक निगोद आदि में स्थित भव्य आत्माएं जो भविष्य में पंच परमेष्ठी बनेंगे उन सबको नमस्कार किया गया है। जैसे श्रेणिक राजा अभी नरक में है परंतु बाद में तीर्थंकर बनने वाले हैं उन्हें भी इस महामंत्र में नमस्कार किया गया है।

शुद्ध दृष्टि से हर जीव अरिहंत सिद्ध है। थोड़े गुणो को बढ़ाकर के बोलना स्तुति है। गुण प्रशंसा अवश्य करनी चाहिए। व्यक्ति का छोटा गुण भी प्रशंसा प्रोत्साहन से बढ़कर के महान उपलब्धि दे सकता है।

आग के ऊपर राख होने पर भी अंदर आग है वैसे ही सभी जीवो में भगवान आत्मा है।

 सभी जीवों के प्रति मैत्री गुणी के प्रति प्रमोद भाव रखना चाहिए

आगम का दूसरा उदाहरण प्रस्तुत करते हुए आचार्य श्री ने बताया कि भरत चक्रवर्ती 32000 राजाओं के राजा थे फिर भी उन्होंने सामान्य राजा श्रेयास के आहार दान की प्रशंसा अनुमोदन की। गुणग्राही बनना चाहिए गुण समर्थन करना चाहिए गुणी की प्रशंसा करनी चाहिए।

भगवान की पूजा भी भगवान के गुणो की प्रशंसा है पहले मैं भी नहीं जानती थी गुरुदेव ने पढ़ाया तब ज्ञात हुआ। पुज्य के गुणानुवाद से हमें भी भगवान के गुण प्राप्त होते हैं वैसे ही सामान्य लोगों के भी गुणो की प्रशंसा करने से हमें भी वह गुण प्राप्त होते हैं.। हजारों दोष हो तो भी उन दोषो को नहीं एक गुण हो तो उसको ही देखना चाहिए।

किसी पापी की निंदा नहीं करना

पापी के पाप की निंदा करके हमें अनेक दुर्गतियो में भ्रमण करना पड़ेगा हो सकता है वह पापी गुरु सानिध्य प्राप्त करके अपने पापों को मिटा कर अपन से पहले भगवान बन जाए अतः किसी पापी की निंदा नहीं करनी,पाप की अनुमोदना भी नहीं करनी चाहिए।

मुनि श्री सुविज्ञ सागर जी ने आचार्य श्री द्वारा रचित कविता बच्चों तुम निर्माता हो भावी भाग्य के स्वयं के विकास के राष्ट्र निर्माण के। द्वारा मंगलाचरण किया। यह जानकारी विजयलक्ष्मी गोदावत सागवाड़ा ने दी।

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