स्थविराचार्य श्री 108 संभवसागरजी महाराज के 60वें दीक्षा दिवस पर उनके तप, त्याग, संयम, आगम ज्ञान और आध्यात्मिक साधना पर आधारित यह विशेष आलेख प्रस्तुत है। उनका संपूर्ण जीवन जैन साधना की अनुपम प्रेरणा है। पढ़िए श्रीफल साथी मनोज जैन नायक की यह रिपोर्ट।
मुरैना/श्री सम्मेद शिखर जी। आचार्य श्री आदिसागर जी अंकलीकर स्वामी की गौरवशाली परम्परा के वरिष्ठ संत, स्थविराचार्य श्री 108 संभवसागरजी महाराज का 60वाँ दीक्षा दिवस 16 जुलाई को श्रद्धा एवं भक्ति के साथ मनाया जा रहा है। उनका जीवन तप, त्याग, संयम, आगम अध्ययन और आत्मसाधना की अनुपम मिसाल माना जाता है।
जन्म से वैराग्य तक की प्रेरक यात्रा
स्थविराचार्य श्री संभवसागरजी महाराज का जन्म 3 मई 1941 को कर्नाटक के मंगलूर जिले के बैंदर ग्राम में सूर्यवंशी क्षत्रिय परिवार में हुआ। उनका बाल्यकालीन नाम मंजुनाथ था। सांसारिक जीवन के बीच मंदारगिरि में दिगम्बर जैन धर्म से परिचय होने पर उनके जीवन की दिशा बदल गई। उन्होंने स्वाद त्याग, ब्रह्मचर्य और संयम को अपनाते हुए आत्मकल्याण का मार्ग स्वीकार किया।
दीक्षा और आचार्य पद की गौरवशाली यात्रा
8 जून 1964 को उन्होंने सप्तम प्रतिमा व्रत ग्रहण कर ब्रह्मचारी पार्श्वकीर्ति नाम प्राप्त किया। इसके बाद 6 जुलाई 1967 को हुमचा पद्मावती तीर्थ में आचार्य श्री महावीरकीर्ति जी ऋषिराज से जैनेश्वरी मुनि दीक्षा प्राप्त कर ‘मुनि संभवसागर’ बने। पाँच वर्षों की कठोर साधना के उपरांत उन्हें ‘स्थविर’ पद प्रदान किया गया तथा 31 जुलाई 1980 को वात्सल्य रत्नाकर आचार्य श्री विमलसागर जी ने उन्हें आचार्य पद से विभूषित किया।
तप, साधना और ग्रंथ रचना
स्थविराचार्य संभवसागरजी महाराज ने हजारों उपवास, अनेक कठिन व्रत एवं दीर्घकालीन तप साधनाएँ की हैं। उन्होंने अनेक धार्मिक ग्रंथों तथा ‘धवलसार’ जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथ की रचना कर जैन साहित्य को समृद्ध किया। शिखरजी की 168 वंदनाएँ पूर्ण कर उन्होंने अतुलनीय पुण्यार्जन किया। वर्तमान में वे आजीवन अन्न एवं षट्-रस का त्याग कर 12 वर्ष की सल्लेखना साधना में श्री सम्मेद शिखर जी स्थित त्रियोग आश्रम में लीन हैं।
संत परम्परा के प्रेरणास्रोत
स्थविराचार्य श्री संभवसागरजी महाराज का सान्निध्य अनेक संतों को प्राप्त हुआ। वाक्केशरी आचार्य श्री विनिश्चयसागरजी महाराज ने भी सम्मेद शिखर जी में उनके सान्निध्य में तत्वचर्चा, वैयावृत्ति और आध्यात्मिक मार्गदर्शन का लाभ प्राप्त किया। संघस्थ बालाचार्य मुनि मोक्षसागरजी, मुनि समयसागरजी तथा आर्यिका योग श्रमणी पुनीत चैतन्यमति माताजी सहित अनेक साधु-साध्वियाँ उनकी आज्ञा में धर्म प्रभावना में निरंतर संलग्न हैं।
प्रेरणा का अमिट स्रोत
आचार्य श्री संभवसागरजी महाराज का संपूर्ण जीवन संयम, आत्मानुशासन, वैराग्य और जिनवाणी के प्रति समर्पण का अनुपम उदाहरण है। वे वर्तमान जैन संत परम्परा के सबसे वरिष्ठ मुनिराजों में प्रतिष्ठित हैं और उनका जीवन प्रत्येक साधक को आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।
समापन
60वें दीक्षा दिवस के पावन अवसर पर देशभर के श्रद्धालु एवं जैन समाज स्थविराचार्य श्री संभवसागरजी महाराज के चरणों में श्रद्धा-सुमन अर्पित कर उनके उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घ साधना एवं लोककल्याण की मंगलकामना कर रहे हैं।













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