प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की अक्षुण्ण मूल बाल ब्रह्मचारी पट्ट परंपरा के पंचम पट्टाधीश वात्सल्य वारिधी राजकीय अतिथि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी धोद सीकर में 36 साधुओं सहित विराजित हैं। तीन दिवसीय 37 वां आचार्य पदारोहण महोत्सव श्रुत संरक्षण वात्सल्य दिवस के तहत बुधवार को प्रातः श्रीजी के अभिषेक, शांतिधारा की गई। धोद से पढ़िए, डॉ.राजेश पंचोलिया की यह खबर…
धोद। प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की अक्षुण्ण मूल बाल ब्रह्मचारी पट्ट परंपरा के पंचम पट्टाधीश वात्सल्य वारिधी राजकीय अतिथि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी धोद सीकर में 36 साधुओं सहित विराजित हैं। तीन दिवसीय 37 वां आचार्य पदारोहण महोत्सव श्रुत संरक्षण वात्सल्य दिवस के तहत बुधवार को प्रातः श्रीजी के अभिषेक, शांतिधारा की गई। श्री वर्धमान सागर निलय (संत भवन ) का पुण्यार्जक परिवारों ने शिलान्यास किया। संघ की आहार चर्या के बाद शाम को श्री जी और आचार्य श्री की आरती की गई। रात्रि 8 बजे से सांस्कृतिक कार्यक्रम एवं निशांत जैन ने नाटिका की प्रस्तुति दी।
आचार्य श्री वर्धमान सागर निलय का शिलान्यास
15 जुलाई आषाढ़ सुदी एकम को आचार्य श्री वर्धमान सागर निलय (संत भवन) के निर्माण के लिए आचार्य श्री वर्धमान सागर संघ 36 पिच्छियों के सानिध्य में संपूर्ण समाज ने शिलान्यास विधानाचार्य पंडित मुकेश शास्त्री महावीर के निर्देशन में किया। भूमि पूजन और शिलान्यास अष्ट द्रव्यों से आचार्य श्री के मंत्रोच्चार से किया गया। केशर से शिलाओं को आचार्य श्री ने अभिमंत्रित किया। इस अवसर पर अनेक सधर्मियों ने स्वर्ण, रजत सामग्री भी डाली।
इन्होंने किया चित्र का अनावरण
आचार्य श्री के प्रवचन के पूर्व चित्र अनावरण एवं दीप प्रज्वलन समाज के कैलाश काला, सुशील सेठी आदि ने किया। आचार्य श्री के चरण प्रक्षालन ज्ञानचन्द,महेश काला ने तथा जिनवाणी भेंट महेश मंजू काला ने की।
व्यवहार विवेक पूर्वक करना चाहिए
आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन में कहा कि मनुष्य जीवन अनेक जन्मों के संचित पुण्यों का फल है। इस दुर्लभ जीवन को सार्थक बनाने के लिए आत्म चिंतन आवश्यक है। उन्होंने कहा कि हमारा सौभाग्य है कि हमें सर्वज्ञ, हितोपदेशी तीर्थंकरों के जैन धर्म में जन्म मिला तथा देव, शास्त्र और गुरु की शरण प्राप्त हुई। डॉ. राजेश पंचोलिया और हितेश रारा मारोठ ने बताया कि आचार्यश्री ने प्रवचन में कहा कि संतों का समागम जीवन में उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है। इसलिए मनुष्य को अपने प्रत्येक कार्य- बोलना, उठना, बैठना, खाना-पीना एवं व्यवहार विवेक पूर्वक करना चाहिए।
जीवन में सद्विचार, सत्चिंतन रखें
स्वस्थ और श्रेष्ठ जीवन मन, वचन और संयमित खान-पान पर निर्भर करता है। उन्होंने कहा कि भगवान की प्रतिमा के दर्शन सदैव विनय एवं श्रद्धा के साथ करने चाहिए। खान-पान में भक्ष्य-अभक्ष्य, न्याय-अन्याय तथा धर्मानुकूल आचरण का विशेष ध्यान रखना चाहिए। पुण्य के उदय से प्राप्त इस मनुष्य जीवन में सद्विचार, सत्चिंतन और संयम धारण कर आत्मकल्याण की दिशा में निरंतर अग्रसर होना ही जीवन की वास्तविक सफलता है। प्रवचन के पूर्व सभी पूर्वाचार्यों को अर्घ्य समर्पित कर आचार्य श्री का अष्ट द्रव्यों से पूजन किया गया।
जनवाणी संरक्षण पर होगी देशना
16 जुलाई को जिनवाणी संरक्षण पर आचार्य श्री देश के समाज को महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान करेंगे। दोपहर को आचार्य श्री के 37 वें आचार्य पदारोहण कार्यक्रम में संघ के साधुओं, विद्वानों और समाज की ओर से आचार्य श्री का गुणानुवाद किया जाएगा।













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