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प्रज्ञाहीन, विवेकहीन व्यक्ति अंधे के समान है : वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी गुरुदेव ने सम्यक दर्शन और भाव-शुद्धि का महत्व बताया


अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी गुरुदेव ने विवेक, सम्यक दर्शन, भाव-शुद्धि और संयमपूर्ण जीवन का महत्व बताते हुए कहा कि बाह्य तप तभी सार्थक है जब उसके साथ अंतःकरण की पवित्रता जुड़ी हो। पढ़िए श्रीफल साथी अजीत कोठिया डडूका की यह रिपोर्ट।


सागवाड़ा। पुनर्वास कॉलोनी से आयोजित अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में विश्व धर्म प्रभाकर वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी गुरुदेव ने कहा कि प्रज्ञा और विवेक के बिना मनुष्य अंधे के समान हो जाता है। जिस प्रकार उत्तम दर्पण होने पर भी अंधा स्वयं को नहीं देख सकता, उसी प्रकार विवेकहीन व्यक्ति सत्य का बोध नहीं कर पाता।

विवेक से ही हित-अहित की पहचान

गुरुदेव ने कहा कि संकीर्ण स्वार्थ से प्रेरित धर्म अंततः अनर्थ का कारण बनता है। विवेक ही मनुष्य को हित और अहित का ज्ञान कराता है। केवल रटंत धार्मिक ज्ञान आत्मकल्याण नहीं करता, बल्कि उससे अहंकार बढ़ सकता है। संयम, सम्यक श्रद्धा, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र का समन्वय ही वास्तविक धर्म है।

भाव-शुद्धि के बिना तप और त्याग निष्फल

उन्होंने स्पष्ट किया कि बाह्य तपस्या और परिग्रह का त्याग तभी सार्थक है जब उसके साथ अंतरंग की विशुद्धि जुड़ी हो। यदि साधु भी अशुद्ध भाव से त्याग करें तो उसका आध्यात्मिक लाभ नहीं मिलता। त्याग यदि अहंकार, लोभ या भोग की भावना से किया जाए तो वह निष्फल हो जाता है।

सम्यक दृष्टि और पुण्य का महत्व

धर्माचार्य ने कहा कि सम्यक दृष्टि वाला जीव सात प्रकार के भय से मुक्त रहता है तथा संसार, शरीर और भोगों से विरक्त होता है। पुण्य से सभी प्रकार की संपदाएँ प्राप्त होती हैं, परंतु उनका सदुपयोग तभी संभव है जब जीवन में विवेक और आत्मजागरण हो।

श्रवण के साथ चिंतन और मनन आवश्यक

उन्होंने कहा कि धार्मिक प्रवचनों का केवल श्रवण पर्याप्त नहीं है। श्रवण के बाद चिंतन, मनन और मंथन करने से ही ज्ञान जीवन में उतरता है। भाव के बिना कोई भी साधना सिद्धि या मानसिक शांति प्रदान नहीं कर सकती।

मुनिश्री ने कविता के माध्यम से दिया संदेश

मुनि श्री सुविज्ञ सागर जी ने आचार्यश्री द्वारा रचित कविता “कितना प्यारा भाव है मेरा, मेरा आत्मविश्वास ज्ञान चरित्र वाला” का वाचन करते हुए आत्मविश्वास, ज्ञान और चरित्र के महत्व को रेखांकित किया।

समापन

वेबीनार के माध्यम से गुरुदेव ने उपस्थित श्रद्धालुओं को भाव-शुद्धि, विवेक, संयम और आत्मचिंतन को जीवन का आधार बनाने की प्रेरणा दी। कार्यक्रम में अनेक जिज्ञासुओं ने ऑनलाइन सहभागिता कर धर्मोपदेश का लाभ प्राप्त किया।

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