मध्यप्रदेश के बीना स्थित अनेकांत ज्ञान मंदिर (श्रुतधाम) आज जैन श्रुत परंपरा, प्राचीन पांडुलिपियों के संरक्षण, प्राकृत अध्ययन और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का राष्ट्रीय केंद्र बन चुका है। यह केवल तीर्थ नहीं, बल्कि ज्ञान, साधना और संस्कृति का जीवंत आंदोलन है। पढ़िए श्रीफल साथी प्रो. आरके जैन “अरिजीत” का यह विशेष आलेख।
बीना (सागर, मप्र)। समय भले ही राजमहलों को धूल से ढक दे, किंतु ज्ञान और श्रुत की ज्योति कभी समाप्त नहीं होती। किसी भी समाज की सबसे बड़ी धरोहर उसके ग्रंथ, उसकी परंपरा और उसकी सांस्कृतिक स्मृतियाँ होती हैं। इन्हीं अमूल्य निधियों के संरक्षण और पुनर्जागरण का दिव्य केंद्र है अनेकांत ज्ञान मंदिर (श्रुतधाम), जो राष्ट्रसंत आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के शिष्य दिगम्बर जैन मुनि श्री सरलसागर जी महाराज के पावन सान्निध्य में विकसित हुआ।
श्रुत परंपरा के पुनर्जागरण का केंद्र
20 फरवरी 1992 को स्थापित श्रुतधाम केवल एक संस्थान नहीं, बल्कि जैन श्रुत परंपरा के संरक्षण का ऐतिहासिक संकल्प है। स्थापना के बाद से यहाँ दुर्लभ जैन ग्रंथों, प्राचीन पांडुलिपियों तथा आगमिक साहित्य के संग्रह, संरक्षण, अध्ययन और प्रकाशन का निरंतर कार्य किया जा रहा है।
दुर्लभ पांडुलिपियों का अमूल्य भंडार
देश के 15 राज्यों के 600 से अधिक स्थानों से एकत्रित 30 हजार से अधिक दुर्लभ जैन ग्रंथ तथा 200 से अधिक ताड़पत्र एवं प्राचीन पांडुलिपियाँ श्रुतधाम की अमूल्य धरोहर हैं। लगभग 1300 वर्ष पुरानी सुभाषित रत्नावली तथा लगभग 400 वर्ष पुराना स्वर्णाक्षरित भक्तामर स्तोत्र यहाँ संरक्षित हैं, जो भारतीय ज्ञान परंपरा की अमूल्य विरासत को सुरक्षित रखे हुए है
जहाँ ज्ञान जीवन से जुड़ता है
श्रुतधाम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ ग्रंथ केवल संग्रहित नहीं, बल्कि जीवन का मार्गदर्शन करते हैं। ब्रह्मचारी संदीप सरल भैयाजी के मार्गदर्शन में प्राकृत भाषा, जैन दर्शन, आगम अध्ययन तथा शास्त्रों की नियमित कक्षाएँ संचालित होती हैं। ऑनलाइन एवं ऑफलाइन माध्यम से देश-विदेश के जिज्ञासु श्रावकों तक श्रुत साधना का संदेश पहुँचाया जा रहा है।
प्रकृति और अध्यात्म का अद्भुत संगम
श्रुतधाम का विस्तार केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं है। परिसर में सहस्रों वृक्षों तथा चौबीस तीर्थंकरों से संबंधित पावन वनस्पतियों का संरक्षण किया गया है। जैविक खेती एवं पर्यावरण संरक्षण के प्रयास यह संदेश देते हैं कि धर्म केवल पूजा नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति संवेदनशील जीवनशैली भी है।
निर्माणाधीन भव्य मुक्ताकाश समवशरण
श्रुतधाम परिसर में 41 हजार वर्गफुट क्षेत्र में बुंदेलखंड का प्रथम भव्य मुक्ताकाश समवशरण मंदिर निर्माणाधीन है। यह जैन संस्कृति, स्थापत्य और आध्यात्मिक चेतना का अद्भुत केंद्र बनने की दिशा में अग्रसर है।
भारतीय ज्ञान परंपरा का प्रेरणास्रोत
श्रुतधाम आज केवल जैन समाज का तीर्थ नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान, संस्कृति और आध्यात्मिक विरासत के संरक्षण का राष्ट्रीय केंद्र बन चुका है। यहाँ अतीत वर्तमान को दिशा देता है और वर्तमान भविष्य की चेतना का निर्माण करता है। यही कारण है कि श्रुतधाम भवन नहीं, बल्कि एक सतत सांस्कृतिक आंदोलन है।













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