ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी का दिवस जैन परंपरा में श्रुत पंचमी के रूप में अत्यंत श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। यह पर्व केवल ग्रंथ-पूजन का अवसर नहीं है, बल्कि जिनवाणी, ज्ञान, स्वाध्याय, आचार्य-परंपरा, प्राकृत भाषा तथा आध्यात्मिक संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन का राष्ट्रीय-सांस्कृतिक उत्सव है। जबलपुर से पढ़िए, डॉ.यतीश जैन का यह आलेख…प्रेषक- राजेश जैन रागी बकस्वाहा
ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी का दिवस जैन परंपरा में श्रुत पंचमी के रूप में अत्यंत श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। यह पर्व केवल ग्रंथ-पूजन का अवसर नहीं है, बल्कि जिनवाणी, ज्ञान, स्वाध्याय, आचार्य-परंपरा, प्राकृत भाषा तथा आध्यात्मिक संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन का राष्ट्रीय-सांस्कृतिक उत्सव है। जैन परंपरा में यदि महावीर भगवान धर्मतीर्थ के प्रवर्तक हैं, तो श्रुत उनकी वाणी का जीवंत स्वरूप है। भगवान का शरीर काल के प्रभाव से दृष्टि से ओझल हो सकता है, किन्तु उनकी वाणी श्रुत के रूप में युगों-युगों तक जीवित रहती है। इसी कारण श्रुत पंचमी को जिनवाणी का जन्मोत्सव, ज्ञान का महापर्व तथा आगम-संरक्षण दिवस माना जाता है।
जैन दर्शन में ज्ञान को आत्मा का स्वाभाविक गुण कहा गया है। जीव का वास्तविक स्वरूप अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत वीर्य और अनंत सुख से युक्त है, किन्तु कर्मावरणों के कारण उसकी ज्ञान-शक्ति अवरुद्ध हो जाती है। ज्ञान के पाँच भेद बताए गए हैं—मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्ययज्ञान और केवलज्ञान। इनमें श्रुतज्ञान का विशेष स्थान है, क्योंकि यह समस्त लौकिक और आध्यात्मिक ज्ञान की व्यवस्थित अभिव्यक्ति का माध्यम है। मतिज्ञान व्यक्तिगत अनुभव और इन्द्रियों से प्राप्त होता है, जबकि श्रुतज्ञान शब्द, वचन, ग्रंथ और परंपरा के माध्यम से प्राप्त होता है। इसलिए श्रुतज्ञान को ज्ञान के प्रचार और संरक्षण का आधार माना गया है।
महावीर भगवान के समवसरण में जब दिव्यध्वनि प्रकट होती थी, तब गणधर उसे सूत्रबद्ध कर शास्त्रीय स्वरूप प्रदान करते थे। यही गणधर-प्रणीत वाङ्मय आगे चलकर द्वादशांग के रूप में प्रसिद्ध हुआ। यह केवल धार्मिक साहित्य नहीं था, बल्कि दर्शन, तर्कशास्त्र, अध्यात्म, आचार, गणित, ज्योतिष, जीवविज्ञान, ब्रह्मांड-विज्ञान और समाज-दर्शन का विशाल भंडार था। जैन परंपरा का सम्पूर्ण ज्ञान-विज्ञान इसी श्रुत पर आधारित था।
महावीर भगवान के निर्वाण के पश्चात् अनेक शताब्दियों तक यह ज्ञान गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से मौखिक रूप से संरक्षित रहा। उस समय लेखन की अपेक्षा स्मरण पर अधिक बल था। मुनिगण विशाल आगम-साहित्य को कंठस्थ रखते थे। किन्तु कालांतर में अकाल, विहार की कठिनाइयों, स्मरण-शक्ति के क्षय और संघ-विभाजन जैसी परिस्थितियों के कारण मूल आगमों का क्रमशः लोप होने लगा। ऐसी स्थिति में आचार्यों ने अनुभव किया कि यदि उपलब्ध ज्ञान को लिपिबद्ध नहीं किया गया तो वह भी नष्ट हो सकता है।
इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में आचार्य धरसेन का नाम अत्यंत आदर के साथ स्मरण किया जाता है। वे गिरनार पर्वत की चंद्रगुफा में निवास करते थे और उन्हें पूर्वों तथा अंगों के अवशिष्ट ज्ञान का अधिकार प्राप्त था। उन्होंने योग्य शिष्यों की खोज की और दक्षिण भारत से आए दो महान तपस्वियों—आचार्य पुष्पदंत तथा आचार्य भूतबली—को अपने पास बुलाकर उपलब्ध श्रुत का उपदेश दिया।
दोनों आचार्यों ने गुरु से प्राप्त इस अमूल्य ज्ञान को लिपिबद्ध कर विश्व के प्राचीनतम दार्शनिक ग्रंथों में से एक षट्खण्डागम की रचना की। यह ग्रंथ कर्मसिद्धांत का अद्वितीय विश्वकोश माना जाता है। जब ग्रंथ की रचना पूर्ण हुई तब ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी के दिन उसकी विधिवत पूजा, वंदना और सार्वजनिक प्रतिष्ठा की गई। यही दिन आगे चलकर श्रुत पंचमी के रूप में प्रसिद्ध हुआ। इस प्रकार यह पर्व वस्तुतः ज्ञान के संरक्षण, लिपिबद्धीकरण और शास्त्रीय परंपरा की विजय का प्रतीक है।
श्रुत पंचमी का महत्व केवल ऐतिहासिक नहीं, बल्कि अत्यंत गहन दार्शनिक भी है। जैन आचार्यों के अनुसार तीर्थंकर भगवान प्रत्यक्ष मोक्षमार्ग के प्रवर्तक होते हैं, किन्तु उनके निर्वाण के पश्चात् जीवों को मार्गदर्शन श्रुत के माध्यम से ही प्राप्त होता है। इसलिए जिनवाणी को प्रत्यक्ष तीर्थंकर के समान पूज्य माना गया है। अनेक आचार्यों ने कहा है कि जिनवाणी संसार-सागर में भटकते जीवों के लिए प्रकाश स्तंभ है। वह मोह के अंधकार को दूर कर आत्मा के वास्तविक स्वरूप का बोध कराती है।
श्रुत पंचमी को प्राकृत दिवस के रूप में भी विशेष महत्व दिया जाता है। इसका कारण यह है कि महावीर भगवान की दिव्यध्वनि को जिस भाषा में संरक्षित किया गया, वह अर्धमागधी प्राकृत थी। जैन आगमों, सिद्धांत ग्रंथों और प्राचीन साहित्य का विशाल भाग प्राकृत भाषाओं में रचा गया है। शौरसेनी, अर्धमागधी, महाराष्ट्री और जैन प्राकृत की विभिन्न धाराओं ने भारतीय भाषाओं और साहित्य को अत्यंत समृद्ध किया है। वस्तुतः प्राकृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारतीय जनजीवन की सांस्कृतिक चेतना की अभिव्यक्ति है।
संस्कृत जहाँ मुख्यतः विद्वानों और राजसभाओं की भाषा रही, वहीं प्राकृत जनसामान्य की भाषा थी। महावीर भगवान ने लोककल्याण की भावना से उसी भाषा में उपदेश दिया जिसे सामान्य व्यक्ति समझ सके। यही कारण है कि जैन धर्म में भाषा को ज्ञान-प्रसार का माध्यम माना गया, न कि विद्वत्ता के प्रदर्शन का साधन। श्रुत पंचमी हमें यह स्मरण कराती है कि धर्म तभी जीवित रहता है जब उसकी वाणी जन-जन तक पहुँचती है।
प्राकृत भाषा ने भारतीय भाषाओं के विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हिन्दी, गुजराती, राजस्थानी, मराठी और अनेक आधुनिक भारतीय भाषाओं की जड़ें प्राकृत परंपरा में निहित हैं। जैन आचार्यों ने हजारों ग्रंथों की रचना प्राकृत में करके न केवल धर्म का संरक्षण किया, बल्कि भारतीय भाषिक विरासत को भी समृद्ध बनाया। इसलिए आज अनेक संस्थाएँ श्रुत पंचमी के अवसर पर प्राकृत दिवस मनाती हैं, प्राकृत भाषा के अध्ययन को प्रोत्साहित करती हैं तथा नई पीढ़ी को इस महान भाषिक धरोहर से परिचित कराती हैं।
जैन साहित्य में श्रुत को सर्वोच्च सम्मान प्राप्त है। आचार्य कुन्दकुन्द, आचार्य समन्तभद्र, आचार्य पूज्यपाद, आचार्य अकलंकदेव, आचार्य विद्यानन्द तथा अन्य महान आचार्यों ने जिनवाणी को मोक्षमार्ग का दीपक कहा है। उनके अनुसार सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति के लिए सम्यग्ज्ञान आवश्यक है और सम्यग्ज्ञान की प्राप्ति का प्रमुख साधन श्रुत है। इसलिए श्रुत की आराधना वस्तुतः आत्मकल्याण की आराधना है।
श्रुत पंचमी के अवसर पर जिनालयों में सिद्धांत ग्रंथों का विशेष पूजन किया जाता है। ग्रंथों की सफाई, संरक्षण, बंधन और सूचीकरण किया जाता है। स्वाध्याय सभाएँ, शास्त्र चर्चाएँ, आगम परीक्षा, प्राकृत भाषा संगोष्ठियाँ तथा ज्ञान-वितरण कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। अनेक स्थानों पर पुस्तकालयों के विकास, प्राचीन पांडुलिपियों के डिजिटलीकरण तथा जैन साहित्य के प्रकाशन का संकल्प लिया जाता है। यह परंपरा इस तथ्य को रेखांकित करती है कि धर्म का वास्तविक संरक्षण मंदिरों के साथ-साथ ग्रंथों और ज्ञान-केंद्रों के संरक्षण से भी होता है।
आज के सूचना-प्रधान युग में श्रुत पंचमी का संदेश और अधिक प्रासंगिक हो जाता है। ज्ञान के असंख्य स्रोत उपलब्ध हैं, किन्तु सत्य और प्रामाणिकता का संकट भी बढ़ा है। ऐसे समय में जिनवाणी विवेक, तर्क, अनेकांत, अहिंसा और आत्मानुशासन का मार्ग दिखाती है। यह पर्व हमें स्मरण कराता है कि केवल सूचना पर्याप्त नहीं, बल्कि शुद्ध ज्ञान, सम्यक् दृष्टि और चरित्र का विकास ही मानव जीवन का वास्तविक उद्देश्य है।
श्रुत पंचमी वस्तुतः ज्ञान के प्रति कृतज्ञता का पर्व है। यह उन आचार्यों के प्रति श्रद्धांजलि है जिन्होंने अपने तप, त्याग और असाधारण स्मरण-शक्ति के बल पर जिनवाणी को सुरक्षित रखा। यह उन लिपिकारों, पंडितों, ग्रंथपालों और विद्वानों का भी सम्मान है जिन्होंने पांडुलिपियों और ग्रंथों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी संरक्षित किया। साथ ही यह नई पीढ़ी को यह संदेश देता है कि यदि ज्ञान-संस्कृति जीवित रहेगी, तभी धर्म और सभ्यता भी जीवित रहेंगे। इस प्रकार श्रुत पंचमी केवल एक धार्मिक तिथि नहीं है; यह जिनवाणी की महिमा, ज्ञान की साधना, प्राकृत भाषा की गौरवशाली परंपरा, आचार्य-ऋण की स्मृति तथा आत्मोन्नति की प्रेरणा का महापर्व है। यह दिवस हमें प्रेरित करता है कि हम केवल ग्रंथों की पूजा तक सीमित न रहें, बल्कि उनमें निहित अहिंसा, अनेकांत, अपरिग्रह, करुणा और आत्मशुद्धि के संदेश को अपने जीवन में उतारें। यही श्रुत पंचमी की वास्तविक आराधना और जिनवाणी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।













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