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धर्म भय का नाम नहीं, बल्कि जीवन की दिशा है : ‎ ‎धर्म तो वह पवित्र चेतना है, जो मनुष्य को उसके भीतर के सत्य से परिचित कराती है


जहां भय समाप्त होता है, वहीं से धर्म की शुरुआत होती है। मनुष्य के जीवन में जैसे ही धर्म शब्द प्रवेश करता है, उसके मन में अनेक प्रश्न जन्म लेने लगते हैं। ‎यह कैसे करना होगा ? इसकी क्रियाएँ क्या होंगी? कहीं कोई गलती न हो जाए? यदि त्रुटि हो गई तो उसका परिणाम क्या होगा? मुरैना/सांगानेर से पढ़िए, अंशुल जैन शास्त्री का यह आलेख, प्रस्तुति मनोज जैन नायक…


मुरैना/सांगानेर। जहां भय समाप्त होता है, वहीं से धर्म की शुरुआत होती है। मनुष्य के जीवन में जैसे ही धर्म शब्द प्रवेश करता है, उसके मन में अनेक प्रश्न जन्म लेने लगते हैं। ‎यह कैसे करना होगा ? इसकी क्रियाएँ क्या होंगी? कहीं कोई गलती न हो जाए? यदि त्रुटि हो गई तो उसका परिणाम क्या होगा? ‎इन प्रश्नों की भीड़ में मनुष्य का मन अक्सर भय से भर जाता है ‎परंतु, सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि ‎क्या वास्तव में धर्म भय का नाम है? ‎क्या धर्म केवल डराने के लिए है? ‎या फिर धर्म वह प्रकाश है, जो जीवन को सही दिशा प्रदान करता है? यदि वास्तविकता में देखा जाए तो धर्म कभी भय का विषय रहा ही नहीं। ‎हमने स्वयं अपनी संकीर्ण धारणाओं और सामाजिक दबावों के कारण धर्म को भय का रूप दे दिया है। ‎हम डरते हैं कि कहीं कोई दोष न लग जाए, कोई हमें तुच्छ न समझ ले, कोई हमारी आलोचना न कर दे। ‎लेकिन धर्म का वास्तविक स्वरूप इन भय और आशंकाओं से कहीं ऊपर है। ‎धर्म तो वह पवित्र चेतना है, जो मनुष्य को उसके भीतर के सत्य से परिचित कराती है।

वह जीवन को संयम, विवेक और आत्मबोध की ओर ले जाती है। ‎धर्म मनुष्य को दबाता नहीं, बल्कि उसे भीतर से इतना मजबूत बनाता है कि वह स्वयं अपने जीवन का सही निर्धारण कर सके। ‎हाँ, यह सत्य है कि कभी-कभी कुछ लोग, जो स्वयं को धर्म का ज्ञाता या महान व्यक्ति मान लेते हैं, धर्म के नाम पर दूसरों को भयभीत करने का प्रयास करते हैं। ‎वे धर्म को कठोर नियमों और भय की सीमाओं में बाँध देते हैं ‎परंतु, किसी व्यक्ति का व्यवहार धर्म नहीं होता।

 वास्तव में धर्म डर का नाम नहीं है

‎धर्म का वास्तविक स्वरूप तो करुणा, शांति और आत्मजागरण है। ‎यदि धर्म को सही अर्थों में समझा जाए, तो वही मनुष्य के जीवन को धरती से लेकर मोक्ष तक की यात्रा में सुगम बनाता है। ‎महान आचार्यों और ऋषियों ने अपने शास्त्रों में धर्म को कभी भय का साधन नहीं कहा। ‎उन्होंने धर्म को आत्मा को पहचानने का मार्ग बताया है। ‎उन्होंने शास्त्रों को जीवन का आधार इसलिए माना, क्योंकि वे मनुष्य को अज्ञान से ज्ञान की ओर ले जाते हैं। ‎वास्तव में धर्म डर का नाम नहीं है।

‎धर्म तो प्रेरणा का नाम है। ‎वह प्रेरणा, जो मनुष्य को पतन से उठाकर उत्कर्ष की ओर ले जाए; ‎जो उसे भीतर से निर्मल बनाए ‎और जो उसके जीवन में ऐसा प्रकाश भर दे कि फिर उसे किसी भय की आवश्यकता ही न रहे। जहाँ भय समाप्त होता है, वहीं से सच्चे धर्म की शुरुआत होती है।

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