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मनुष्य जीवन साधनों के लिए नहीं साधना के लिए है : आचार्यश्री निर्भर सागरजी ने बताए जीवन को साधने के साधन


आचार्य श्री निर्भयसागर जी महाराज ससंघ महरौनी में विगत 8 दिनों से विराजित हैं, जो हर दिन अपने दिव्य प्रवचन के माध्यम से ज्ञान की गंगा बहा रहे हैं। गुरुवार को धर्मसभा में आचार्य श्री ने कहा कि मनुष्य जीवन साधना के लिए मिला है साधनों के लिए नहीं। व्यक्ति जीवन भर साधन जुटाता है और आत्म साधना के लक्ष्य को भूल जाता है। महरौनी से राजीव सिंघई की पढ़िए, यह खबर…


महरौनी(ललितपुर)। आचार्य श्री निर्भयसागर जी महाराज ससंघ महरौनी में विगत 8 दिनों से विराजित हैं, जो हर दिन अपने दिव्य प्रवचन के माध्यम से ज्ञान की गंगा बहा रहे हैं। गुरुवार को धर्मसभा में आचार्य श्री ने कहा कि मनुष्य जीवन साधना के लिए मिला है साधनों के लिए नहीं। व्यक्ति जीवन भर साधन जुटाता है और आत्म साधना के लक्ष्य को भूल जाता है। साधनों से सारी जिंदगी सुख भोगता है फिर भी तृप्त नहीं हो पाता है। यदि साधना एक बार कर ले तो जीवन सुधर जाता है। आचार्य श्री ने कहा कि जीवन का लक्ष्य इंद्रियों का सुख जीवन का भोग नहीं, आत्मा के उपभोग का भोग होना चाहिए। ज्ञान, सुख, संवेदना ही आत्मा का भोग है। इंद्रिय सुख भोगने से दुख मिलता है और आत्मा का सुख भोगने से सुख मिलता है।

प्रत्येक व्यक्ति को जीवन को भोग नहीं उपयोग करना चाहिए। आचार्य श्री ने कहा मनुष्य को फालतू बातों में समय न गंवाकर, अपना कीमती समय स्वयं के कल्याण में लगाना चाहिए क्योंकि, व्यक्ति के जीवन का कोई भरोसा नहीं है। जीवन एक पानी की बूंद के समान है। जीवन एक घड़ी है, जीवन उड़ती हुई पतंग है, यह कब मिट जाए, कब बुझ जाए, कब कट जाए इसका कोई भरोसा नहीं। व्यक्ति को अपना व्यक्तित्व नर से नार की ओर नहीं, बल्कि नर से नारायण की ओर ले जाना चाहिए।

नर से नारायण बनने के लिए व्यक्ति को कम खाना, गम खाना और नम जाना चाहिए। मानव जीवन चलाने के लिए व्यक्ति को रोटी, कपड़ा और मकान इन तीन वस्तुओं की आवश्यकता होती है और मोक्ष जाने के लिए भी सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान, सम्यक चारित्र तीन चीजों की ही आवश्यकता होती है। जो सहन करता है, वही समर्थ बनता है। जीवन मे एक सूत्र अपनाओ जीवन में कितना भी दुख आए, कितनी भी प्रतिकूलताएं आएं, कैसी भी परेशानियां हों, अपना धैर्य मत खोओ और सहन करो, जो सामने आए, उसका सामना करो। इस मौके पर बड़ी संख्या में श्रद्धालुजन उपस्थित रहे।

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