अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में आचार्य कनक नंदीजी ने कहा कि सूर्य-चंद्रमा पर जाना आसान है, लेकिन स्वयं को जानना सबसे कठिन कार्य है। उन्होंने आत्मा, पुण्य और शुद्ध भावों की शक्ति को समझाते हुए जीवन में धर्म की सही दिशा बताई। — अजीत कोठिया डडूका की रिपोर्ट
डडूका। सिद्धांत चक्रवर्ती वैज्ञानिक धर्माचार्य आचार्य श्री कनक नंदीजी गुरुदेव ने शिवगौरी आश्रम से आयोजित अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में कहा कि सूर्य और चंद्रमा पर जाना सरल है, लेकिन स्वयं को जानना अत्यंत कठिन है। उन्होंने बताया कि हम जिस स्थान पर बैठे हैं, वहीं अनंत बार जन्म-मरण का चक्र पूरा कर चुके हैं।
भावों की शक्ति का चमत्कार
गुरुदेव ने कहा कि चैतन्य का चमत्कार भावों का चमत्कार है। शुभ भाव, सेवा, दान और साधु के आशीर्वाद से बड़े-बड़े रोग भी समाप्त हो सकते हैं। जब पुण्य से मोक्ष प्राप्त हो सकता है, तो सांसारिक सुख और मानसिक-शारीरिक स्वास्थ्य क्यों नहीं मिल सकता।
आत्मा और पुण्य की अनंत शक्ति
उन्होंने समझाया कि आत्मा, पुण्य और भावना की शक्ति अनंत है। जब भाव पूरी तरह शुद्ध हो जाते हैं, तब आत्मा के दस धर्म और अनंत शक्तियां प्रकट होती हैं।
दिखावे का धर्म व्यर्थ
आचार्य श्री ने चेतावनी देते हुए कहा कि चोर, एनाकोंडा या बगुले की तरह धर्म का दिखावा करना स्वयं को धोखा देना है। सच्चा धर्म आंतरिक शुद्धता में है, न कि बाहरी आडंबर में।
पवित्र भाव ही धर्म का मूल
उन्होंने कहा कि भाव ही मनुष्य को नरक या स्वर्ग ले जाते हैं। यदि धर्म करते समय भाव शुद्ध नहीं है, तो अधिक पाप बंध होता है। इसलिए सभी धर्मों का मूल उद्देश्य भावों की पवित्रता है।
जिनवाणी का महत्व
गुरुदेव ने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे समुद्र का एक लोटा जल पूरे समुद्र के गुणों को समझा देता है, वैसे ही थोड़ी सी जिनवाणी में भी वही आत्मज्ञान है जो तीर्थंकरों की दिव्यध्वनि में था।
साधु अवस्था और आत्म विकास
उन्होंने बताया कि साधु, आचार्य, उपाध्याय और अरिहंत सभी सिद्ध अवस्था की ओर बढ़ने के चरण हैं। जैसे सूर्योदय से पहले लालिमा दिखाई देती है, वैसे ही साधु अवस्था आत्म सिद्धि का संकेत है।
हर कोई नहीं समझ पाता धर्म
आचार्य श्री ने कहा कि तीर्थंकर भगवान सभी को उपदेश देते हैं, लेकिन जिसे पुण्य होता है वही समझ पाता है। इसलिए दूसरों को समझाने का प्रयास करें, लेकिन क्रोध या संकलेश नहीं करें, बल्कि माध्यस्थ भाव रखें।
लक्ष्य की ओर बढ़ने का संदेश
उन्होंने बताया कि जैसे लक्ष्य की ओर बढ़ते हुए धीरे-धीरे मंजिल मिलती है, वैसे ही राग-द्वेष और कषायों का त्याग करते हुए आत्मा शुद्ध होती जाती है और मोक्ष मार्ग पर अग्रसर होती है।
मंगलाचरण और सहभागिता
कार्यक्रम की शुरुआत मुनिश्री सुविज्ञ सागर जी द्वारा रचित कविता “मेरा भाव दर्पण सम होय” से हुई। विभिन्न स्थानों से जुड़े जिज्ञासुओं के प्रश्नों का समाधान भी गुरुदेव ने सहज भाषा में किया।













Add Comment