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"जय जिनेन्द्र" केवल अभिवादन नहीं, आत्मविजय का संदेश है : भारतीय संस्कृति और संस्कारों का प्रथम परिचय है हमारा अभिवादन


अभिवादन केवल औपचारिक शब्द नहीं, बल्कि व्यक्ति के संस्कार, संस्कृति और आध्यात्मिक दृष्टि का परिचय है। भारतीय परंपरा में “जय जिनेन्द्र”, “नमस्ते” और अन्य मंगलमय अभिवादन आत्मिक चेतना का संदेश देते हैं। पढ़िए श्रीफल साथी अंशुल जैन शास्त्री का यह विशेष लेख।


मुरैना। मनुष्य जब किसी से मिलता है तो उसके व्यक्तित्व की पहली पहचान उसके अभिवादन से होती है। भारतीय संस्कृति में अभिवादन केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि सम्मान, विनम्रता और आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक माना गया है। जैन धर्म में “जय जिनेन्द्र” ऐसा ही एक पवित्र अभिवादन है, जो आत्मविजय और सद्गुणों की प्रेरणा देता है।

“जय जिनेन्द्र” का आध्यात्मिक अर्थ

“जय जिनेन्द्र” दो शब्दों—”जय” और “जिनेन्द्र”—से मिलकर बना है। ‘जिन’ वह हैं जिन्होंने मन, इंद्रियों तथा क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे आंतरिक विकारों पर विजय प्राप्त की हो। यह अभिवादन सामने वाले व्यक्ति के भीतर स्थित शुद्ध आत्मस्वरूप के प्रति सम्मान प्रकट करता है और स्वयं को भी जिनमार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।

आधुनिकता के साथ संस्कृति भी आवश्यक

आज “Good Morning” जैसे अंग्रेज़ी अभिवादन सामान्य हो गए हैं। यह गलत नहीं है, किंतु अपनी हजारों वर्षों पुरानी भारतीय अभिवादन परंपरा को भूल जाना भी उचित नहीं। आधुनिकता अपनाते हुए अपनी भाषा, संस्कृति और मूल्यों को सुरक्षित रखना प्रत्येक भारतीय का दायित्व है।

भारतीय अभिवादन का महत्व

भारतीय संस्कृति में “नमस्ते”, “जय जिनेन्द्र”, “राम-राम”, “सीताराम” और “हरे कृष्ण” जैसे अभिवादन केवल शब्द नहीं, बल्कि ईश्वर-स्मरण, आत्मीयता और आध्यात्मिक ऊर्जा के प्रतीक हैं। शास्त्रों में भी बड़ों के सम्मान और अभिवादन को आयु, विद्या, यश और बल की वृद्धि का आधार बताया गया है—

“अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः।

चत्वारि तस्य वर्धन्ते— आयुर्विद्या यशो बलम्॥”

युवा पीढ़ी निभाए सांस्कृतिक दायित्व

लेख में कहा गया है कि राष्ट्र की पहचान उसकी युवा पीढ़ी से होती है। यदि युवा अपनी भाषा, संस्कृति और परंपराओं से जुड़ा रहेगा तो आने वाली पीढ़ियाँ भी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ी रहेंगी। आधुनिक शिक्षा और वैश्विक भाषा का ज्ञान आवश्यक है, लेकिन अपनी पहचान का आधार भारतीय संस्कृति ही रहना चाहिए।

आत्मविजय का संदेश

“जय जिनेन्द्र” केवल अभिवादन नहीं, बल्कि स्वयं को अपने आंतरिक शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने की प्रेरणा देने वाला आध्यात्मिक संदेश है। यह हमें भगवान जिनेन्द्र के आदर्शों पर चलने और जीवन में संयम, विनम्रता तथा सदाचार अपनाने की प्रेरणा देता है।

भारतीय अभिवादन अपनाने का आह्वान

लेखक का संदेश है कि सुबह की शुरुआत ईश्वर-स्मरण और भारतीय अभिवादन के साथ करना हमारी संस्कृति की सुंदर परंपरा है। “Good Morning” कहना गलत नहीं, लेकिन “नमस्ते”, “जय जिनेन्द्र”, “राम-राम”, “सीताराम” अथवा “हरे कृष्ण” जैसे भारतीय अभिवादन अपनाकर हम अपनी संस्कृति को जीवंत रख सकते हैं।

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