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भगवान के पूजन के छह अंगों में अभिषेक प्रथम अंग : आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने धर्म उद्देश्य में बताई पूजन की प्रक्रिया


आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का जोबनेर की ओर मंगल विहार चल रहा है। शनिवार को धर्मसभा प्रवचन में जिनपूजन 8 द्रव्यों से करने की विधि के बारे में आचार्य श्री ने बताया कि श्री जी के दर्शन अभिषेक के बाद स्थापना कर सर्व प्रथम जल,चंदन,अक्षत, पुष्प नैवेद्य, दीप धूप,फल से जो वीतरागी, सर्वज्ञ और हितोपदेशी होते हैं, उन्हें आप्त कहते हैं। जयपुर से डॉ.राजेश पंचोलिया की यह रिपोर्ट…


जयपुर। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का जोबनेर की ओर मंगल विहार चल रहा है। शनिवार को धर्मसभा प्रवचन में जिनपूजन 8 द्रव्यों से करने की विधि के बारे में आचार्य श्री ने बताया कि श्री जी के दर्शन अभिषेक के बाद स्थापना कर सर्व प्रथम जल,चंदन,अक्षत, पुष्प नैवेद्य, दीप धूप,फल से जो वीतरागी, सर्वज्ञ और हितोपदेशी होते हैं, उन्हें आप्त कहते हैं। आप्त को देव भी कहते हैं। ऐसे सच्चे देव की श्रावक पूजा करते हैं। पूज्य पुरुषों के, पंच परमेष्ठियों के गुणों का गुणानुवाद करना पूजा कहलाती है। पूजा के छह अङ्ग है- अभिषेक, आह्वान, स्थापना, सन्निधीकरण पूजन और विसर्जन।

शुद्ध धुली हुई सामग्री (अष्ट द्रव्य) लेकर मन्दिर जाएं 

सुरेश सबलावत के अनुसार आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने पूजन विधि में बताया कि धूले हुए बिना किसी से स्पर्शित, शुद्ध वस्त्र धारण कर शुद्ध धुली हुई सामग्री (अष्ट द्रव्य) लेकर मन्दिर जाना चाहिए। जिनेन्द्र देव की पूजा विधि अनुसार अभिषेक पूर्वक करना चाहिए।अनन्तर पूजा की थाली के मध्य में स्वस्तिक बनाकर श्लोक बोलते हुए इस प्रकार अंक लिखने चाहिए। रयणत्तयं च वंदे चउवीस जिणं च सव्वदा वंदे, पञ्च गुरूणं वंदे चारण चरणं सदा वंदे ।। थाली में सबसे ऊपर चंद्रमा बनाकर नीचे तीन बिंदु ऊपर पांच का अंक पंच परमेष्ठी का लिखना चाहिए। बाई और 24 तीर्थंकरों का प्रतीक,दाएं और दो का अंक चारण रिद्धि धारी युगल मुनि नीचे 3 का अंक सम्यक दर्शन,ज्ञान और चारित्र का सूचक होता हैं। देव शास्त्र गुरु के दर्शन खाली हाथ नहीं करना चाहिए।

आरती करके शांति पाठ विसर्जन करें

विजयपथ बोलकर पूजा प्रारंभ की जाती है सर्वप्रथम दोनों हाथों में पुष्प लोंग लेकर स्थापना करें।सर्वप्रथम दोनों हाथों में पुष्प लौंग लेकर क्षेपण करते हुए स्थापना कर जन्म, जरा मृत्यु का नाश करने के लिए जल की तीन धारा, संसार ताप के नाश हेतु चन्दन चढ़ाते समय एक धारा छोडना चाहिए। अक्षयपद की प्राप्ति के लिए अक्षत दोनों मुठ्ठी बांधकर अंगूठा अन्दर रखकर ,कामबाण नाश हेतु पुष्प दोनो हाथों की अंजुलि मिलाकर ,क्षुधा रोग नाश हेतु नैवेद्य प्लेट में रखकर चढ़ाना चाहिए। मोह रूपी अंधकार नाश हेतु दीपक हाथों में लेकर भगवान की आरती करना चाहिए। अष्ट कर्म के दहन हेतु धूप मध्यमा, अनामिका अंगुली और अंगूठा मिलाकर धूप घट में छोड़ना चाहिए।मोक्ष फल की प्राप्ती हेतु फल थाली में रखकर अनर्घ्यपद की प्राप्ती हेतु आठों द्रव्यों को मिश्रित करके थाली में रखकर अर्घ्य चढ़ाएं। अनन्तर जयमाला बोलकर पूर्णार्घ चढ़ावें। पश्चात् आरती करके शान्ति पाठ और विसर्जन करना चाहिए।

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