जैन धर्म के 20वें तीर्थंकर भगवान मुनिसुव्रत नाथ का जन्म और तप कल्याण 23 अप्रैल को मनाया जाएगा। भगवान का जन्म वैशाख कृष्ण नवमी के दिन हुआ था। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों में अभिषेक, शांतिधारा आदि कार्यक्रम किए जाएंगे। इस अवसर पर श्रीफल जैन न्यूज की श्रंखला के तहत यह विशेष प्रस्तुति उप संपादक प्रीतम लखवाल के संकलन और संयोजन में पढ़िए…
इंदौर। 20वें तीर्थंकर भगवान मुनिसुव्रतनाथ जी जन्म और तप कल्याणक इस बार 23 अप्रैल को मनाया जाएगा। मगध देश में राजगृह नाम का नगर में हरिवंश शिरोमणि, काश्यपगोत्रीय, सुमित्र महाराज राज्य करते थे। उनकी रानी का नाम सोमा था। श्रावण कृष्ण द्वितीया के दिन श्रवण नक्षत्र में रानी ने प्राणत इंद्र को गर्भ में धारण किया। अनुक्रम से नौ मास के बाद रानी ने वैशाख कृष्ण दशमी के दिन पुत्र रत्न को जन्म दिया। देवों ने भगवान का जन्मोत्सव मनाकर मुनिसुव्रत नाम प्रकट किया। मल्लिनाथ के बाद 54 लाख वर्ष बीत जाने पर इनका जन्म हुआ। इनकी आयु 30 हजार वर्ष थी।
भगवान मुनि सुव्रतनाथ का तप
कुमारकाल के 7 हजार 500 साल बीज जाने पर भगवान का राज्याभिषेक हुआ। राज अवस्था में प्रभु के 15 हजार वर्ष बीत जाने पर किसी दिन गरजती हुई घनघटा के समय उनके याग हस्ती ने वन का स्मरण कर खाना-पीना बंद कर दिया। उस समय महाराज मुनिसुव्रतनाथ अपने अवधि ज्ञान से उस हाथी के मन की सारी बातें जान गए। वे कौतुहल से भरे मनुष्यों के सामने हाथी का पूर्व भव कहने लगे कि यह हाथी पूर्व भव में तालपुर नगर का नरपति राजा था। अपने उच्च कुल के अभियान सहित इसने अशुभलेश्याओं से सहित मिथ्या ज्ञानी, पात्र-अपात्र की परीक्षा से रहित किमिच्छिक दान दिया था। उसके फलस्वरूप यह हाथी हुआ है। इस समय भी यह अपने अज्ञान आदि का स्मरण न करता हुआ वन का स्मरण कर रहा है। इतना सुनते ही उस हाथी को अपने पूर्व भव का ज्ञान हो गया। उसने प्रभु से संयामासंयम ग्रहण कर लिया। इसी निमित्त से प्रभु को वैराग्य हो गया और लौकांतिक देवों द्वारा पूजा को प्राप्त भगवान अपराजित नामक पालकी पर बैठकर नीलवन पहुंचे। वहां बेला के उपवास का नियम लेकर वैशाख कृष्ण दशमी के दिन एक हजार राजाओं के साथ दीक्षित हो गए। उनकी प्रथम पारणा का लाभ राजगृह नगर के राजा वृषभसेन को प्राप्त हुआ था।













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