छत्रपति नगर आदिनाथ जिनालय में विराजमान उपाध्याय मुनि विश्रुत सागर जी ने ऋषभ सभागृह में धर्म सभा को संबोधित किया। यहां उनके प्रवचन को सुनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद थे। उन्होंने समाजजनों को सहजता और सरलता से भक्ति करने का संदेश दिया। इंदौर से पढ़िए यह खबर…
इंदौर। छत्रपति नगर आदिनाथ जिनालय में विराजमान उपाध्याय मुनि विश्रुत सागर जी ने ऋषभ सभागृह में अपनी मंगल देशना में कहा कि सहज, सरल होना साधुता है और राग, द्वेष, मान, कषाय से भरे रहना असाधुता है। जो अपनी कषयों को जीत लेता है। सहज सरल रहता है। वही सम्यक दृष्टि है। सम्यक दृष्टि जीव संसार शरीर और भोगों से विरक्त रहता है और उसी का मोक्ष मार्ग प्रशस्त होता है। राजेश जैन दद्दू ने बताया कि प्रवचन देते हुए व्यक्त किए।
अपने आगे कहा कि हमारा जन्म आत्मा के कल्याण के लिए हुआ है। आत्मा के कल्याण के लिए पर की दृष्टि गौण होना चाहिए। मोह की चर्चा करते हुए आपने कहा कि मोह मिथ्यात्व है। जितना मोह करोगे दुःखी ही होगे। आत्मा का कल्याण और सुखी होना चाहते हो तो मोह से विरक्ति करो और मैं शरीर नहीं आत्मा हूं। ऐसा चिंतन करो। धर्म सभा का संचालन डॉक्टर जैनेंद्र जैन ने किया।













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