राजस्थान के संत समाचार

राजस्थान के जैन संत 24 ब्रह्म गुणकीर्ति की रचनाधर्मिता से समृद्ध हुआ राजस्थान का शास्त्र भंडारः रामसीता रास के माध्यम से सिद्ध की अपनी विद्वत्ता


राजस्थान में जैन संतों की कड़ी बहुत लंबी है। इनमें एक से एक उद्भट्ट विद्वान सामने आए हैं। जिन्होंने न केवल साहित्य सृजन कर शास्त्रों को समृद्ध किया है बल्कि जैन धर्म की ध्वजा को आगे ले जाकर जैन समाज को धर्म परायणता का पाठ भी पढ़ाया और उन्हें सीख, उपदेश सहित कर्तव्य निभाने जैसे महत्वपूर्ण संदेश भी प्रदान किए। आज एक ऐसे ही बिरले संत ब्रह्म गुणकीर्ति के बारे में जानते हैं। जैन धर्म के राजस्थान के दिगंबर जैन संतों पर एक विशेष शृंखला में 24वीं कड़ी में श्रीफल जैन न्यूज के उप संपादक प्रीतम लखवाल का ब्रह्म गुणकीर्ति के बारे में पढ़िए विशेष लेख…..


इंदौर। राजस्थान के जैन संतों ने जहां इस धरती पर अपना प्रभुत्व कायम कर जैन धर्म के लिए साहित्य की रचना की वहीं जैन जन को धर्म आराधन के लिए उन्होंने प्रेरित भी किया। जैन धर्म के प्रति जन साधारण में जागरण का यह काम राजस्थान के जैन संतों ने बखूबी किया। इन्होंने यहां के अलावा गुजरात, पंजाब, दिल्ली सहित अन्य स्थानों पर विहार कर धर्म ध्वजा को गौरव प्रदान कर जनजागरण को अधिक महत्व दिया। ऐसे ही राजस्थान के जैन संतों की श्रंखला में ब्रह्म गुणकीर्ति की कीर्ति भी दूर तक फैली हुई थी। ब्रह्म गुणकीर्ति ब्रह्म जिनदास जी के शिष्य थे। ये स्वयं भी अच्छे विद्वान थे और ग्रंथ रचना में रुचि लिया करते थे। अभी तक इनकी रामसीता रास के नाम की एक राजस्थानी कृति उपलब्ध हुई है। जिनके अध्ययन के बाद इनकी विद्वत्ता का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। रास का अंतिम भाग में वर्णित है कि ‘श्री ब्रह्मचार जिणदास तु परसाद तेह तणोए। मन वांछित फल होई तु, बोलीइ किस्युं धणुए।।’ ‘गुणकीरति कृत रास तु विस्तारु मनि रलीए।’ ‘बाई धनश्री ज्ञानदास नु, पुण्यमती निरमलीए।।’ ‘गावउ रली रंमि रास तु, पावउ रिद्धि वृद्धिए’।

‘मन वांछित फल होइ तु, संपजि नव निधिए।।’ रामसीता रास एक प्रबंध काव्य है। इसमें काव्यगत सभी गुण मिलते हैं। यह रास अपने समय में काफी लोकप्रिय रहा था। इसलिए इसकी कितनी ही प्रतियां राजस्थान के शास्त्र भंडारों में उपलब्ध होती है। ब्रह्म जिनदास की रचनाओं की समकक्ष यह रचना निश्चय ही राजस्थानी साहित्य में एक अमूल्य निधि है। इस तरह राजस्थान के जैन संत ब्रह्म गुणकीर्ति ने अपने साहित्य से न केवल हिन्दी को समृद्ध किया बल्कि अपने जैन धर्म को भी आगे ले जाने के लिए प्रेरणा दी।

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