जिले का छोटा सा कस्बा था सोजत। वहीं श्वेताम्बर जैन समाज का 400 साल पुराना आदिनाथ मंदिर था। संगमरमर की कारीगरी, सोने के कलश, चांदी के दरवाजे। हर साल महावीर जयंती पर आरती की बोली 7 लाख तक जाती थी। गांव वाले गर्व से कहते कि हमारे भगवान सबसे अमीर हैं। पाली से पढ़िए, यह खबर…
पाली। जिले का छोटा सा कस्बा था सोजत। वहीं श्वेताम्बर जैन समाज का 400 साल पुराना आदिनाथ मंदिर था। संगमरमर की कारीगरी, सोने के कलश, चांदी के दरवाजे। हर साल महावीर जयंती पर आरती की बोली 7 लाख तक जाती थी। गांव वाले गर्व से कहते कि हमारे भगवान सबसे अमीर हैं। उसी कस्बे में रहता था 22 साल का विपुल जैन। पिता पापड़-बड़ी का ठेला लगाते थे। विपुल ने बी.टेक किया था, केट में 99 पर्सेंट आई थी। आईआईटी मुंबई में एमटेक का एडमिशन पक्का था। फीस 1.2 लाख सालाना। स्कॉलरशिप नहीं मिली। विपुल के पिता सेठ मोहनलाल जैन के पास गए। मोहनलाल ट्रस्ट के अध्यक्ष थे। हर साल आरती की बोली वही लगाते थे। सेठजी, बस 50 हजार का लोन दे दो, ब्याज समेत लौटा दूंगा। बेटा पढ़-लिखकर नाम करेगा। मोहनलाल ने सिर हिलाया, बेटा, ट्रस्ट का पैसा भगवान का है। वो सिर्फ धर्म के काम में लगता है। मंदिर का जीर्णाेद्धार चल रहा है। 15 लाख की नई प्रतिमा आ रही है। समझा कर। उसी रात विपुल ने सोजत छोड़ दिया। अहमदाबाद में एक फैक्ट्री में 12 हजार की नौकरी पकड़ ली। आईआईटी का सपना वहीं दम तोड़ गया।
3 साल बाद, 2026 की चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को सोजत के मंदिर में महावीर जन्म कल्याणक था। आरती की बोली शुरू हुई। 1 लाख, 2 लाख, मोहनलाल खड़े हुए 5 लाख एक रुपया। तभी पीछे से आवाज आई, 5 लाख 11 हजार। सबने पलटकर देखा। कोट-पैंट में विपुल खड़ा था। साथ में 4 लड़के-लड़कियां। मोहनलाल चौंके, तू? विपुल हाथ जोड़कर बोला, सेठजी, बोली मैं नहीं लगाऊंगा। बस आपसे 2 मिनट मांगता हूं। सभा शांत हुई। विपुल ने माइक संभाला और कहा कि 3 साल पहले मैं इसी मंदिर में 50 हजार मांगने आया था। नहीं मिले। मैं टूट गया था। फिर अहमदाबाद में मुझे माहेश्वरी समाज के एजुकेशन लोन फाउंडेशन का पता चला। उन्होंने बिना ब्याज 1.5 लाख दिए। शर्त सिर्फ एक थी कि पढ़कर 2 और बच्चों को पढ़ाना। मैंने आईआईटी किया। कैंपस में 28 लाख का पैकेज मिला। आज मैं बेंगलुरु में हूं। मेरे साथ ये चारों बच्चे खड़े हैं। रेखा, इसके पिता हमारे मंदिर में सफाई करते हैं। रमेश, इसकी मां विधवा है, लोगों के घर बर्तन मांजती है। दोनों को मैंने केट की कोचिंग दिलवाई। आज रेखा आईआईएम अहमदाबाद में है, रमेश आईआईएम कलकत्ता में।
सभा में सन्नाटा था। विपुल रुका नहीं। श्वेताम्बर परंपरा ने हमें अपरिग्रह सिखाया- जरूरत से ज्यादा मत जोड़ो। अनेकांतवाद सिखाया- सबका दृष्टिकोण समझो। भगवान महावीर ने राजपाट छोड़कर सत्य खोजा, महल नहीं बनवाए। उन्होंने कहा था- जीवदया सबसे बड़ा धर्म है। तो बताइए सेठजी, क्या भगवान 15 लाख की मूर्ति से ज्यादा खुश होंगे या रेखा के आईआईएम जाने से? क्या सोने के कलश पर चढ़ा घी, रमेश की किताबों पर खर्च हुए पैसों से ज्यादा पवित्र है? मोहनलाल की आंखें झुकी थीं। विपुल ने जेब से चेक निकाला। ये 5 लाख 11 हजार की बोली मैं मंदिर में नहीं लगा रहा। आज हम 5 लोग मिलकर सोजत श्वेताम्बर शिक्षा निधि शुरू कर रहे हैं। इसमें पहला दान मेरा है। इसका ब्याज नहीं होगा। सिर्फ एक वचन होगा- लेने वाला कल 2 और को देगा। अग्रवाल समाज अस्पताल बनाता है। माहेश्वरी समाज स्टार्टअप फंड देता है। राजपुरोहित समाज यूपीएससी कोचिंग चलाता है। सीरवी समाज लॉजिस्टिक हब बना रहा है। तो हम जैन, जिनका मूल मंत्र ही जियो और जीने दो है, सिर्फ पत्थर पर पैसा क्यों लुटाएं? मैं आरती की बोली का विरोधी नहीं। पर जब मेरे समाज का बच्चा फीस के लिए रोए, और हम लाखों की प्रतिमा मंगवाएं- तो वो धर्म नहीं, दिखावा है। तीर्थंकरों ने हमें त्याग सिखाया था, तिजोरी भरना नहीं। सभा में सबसे पहले हाथ चौधरी साब ने उठाया। सीरवी समाज के मुखिया थे। विपुल बेटा, मेरी तरफ से 2 लाख इस निधि में। मेरा पोता भी तेरे साथ आईआईटी में पढ़ता है। फिर माहेश्वरी समाज के व्यापारी बोले कि हमारे कॉमर्स कॉलेज में जैन बच्चों को 50 प्रतिशत स्कॉलरशिप। मोहनलाल उठे। आंखें नम थीं। 70 साल के जीवन में पहली बार वो मंच पर लड़खड़ाए। विपुल, आज तूने मेरी आंखें खोल दी। 40 साल से मैं बोली लगाता आया। सोचा पुण्य मिल रहा है। पर असली पुण्य तो तेरे चेहरे पर है। उन्होंने माइक लिया, ष्आज से सोजत श्वेताम्बर ट्रस्ट का 60 प्रतिशत पैसा शिक्षा और स्वास्थ्य पर लगेगा। 40 प्रतिशत मंदिर रखरखाव पर और हां, श्जैन लोन फाउंडेशनश् आज से ही शुरू। पहला लोन रेखा की छोटी बहन को -एमबीबीएस की फीस के लिए। पूरी सभा खड़ी होकर ताली बजा रही थी। घंटियों की आवाज के बीच एक नई आरती शुरू हो चुकी थी – आत्मनिर्भरता की आरती।
’6 महीने बाद का सोजत’
मंदिर वही था। पर अब उसके पीछे महावीर कोचिंग सेंटर चलता था। 80 बच्चे फ्री में पढ़ते थे। 12 बच्चे नीट जेईई निकाल चुके थे। ट्रस्ट ने 3 परिवारों को बिजनेस लोन दिया था। एक पापड़ का कारखाना, एक केमिकल यूनिट, एक डिजिटल मार्केटिंग फर्म।
दीवाली पर मोहनलाल ने घोषणा कीरू ष्इस साल आरती की बोली नहीं होगी। बोली लगेगी संकल्पों की। कौन कितने बच्चों को पढ़ाएगा, कितने रोजगार देगा- उसकी बोली लगेगी। विपुल दिवाली पर सोजत आया। मंदिर में नई संगमरमर की पट्टिका लगी थी। लिखा था- न स देवेसु बंदामि, जे अन्नं न पहावए। जो दूसरों को आगे न बढ़ाए, मैं उस देव को नहीं पूजता। नीचे छोटा लिखा था-सोजत श्वेताम्बर शिक्षा निधिः 1.2 करोड़, लाभार्थी: 47 छात्र। मोहनलाल ने विपुल को गले लगाया। बेटा, तूने साबित कर दिया- भगवान मूर्ति में नहीं, मजबूर की मदद में बसते हैं। हमने सालों सोने के सिंहासन पर भगवान बिठाए। तूने भगवान को बच्चों की किताबों में बिठा दिया।
श्वेताम्बर जैन दृष्टि से
श्वेताम्बर आगमों में दान को 4 प्रकार का बताया है- आहार दान, औषध दान, ज्ञान दान, अभय दान। ज्ञान दान को सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। भगवान महावीर स्वयं राजा के पुत्र थे। उन्होंने महल, हीरे, सेना सब त्यागकर श्केवलज्ञानश् चुना।
आज जब हम 10 लाख की बोली लगाकर क्षणिक अहंकार तुष्ट करते हैं, तब हम महावीर के ‘अपरिग्रह व्रत के उलट चलते हैं। मंदिर बनाना गलत नहीं- पर मंदिर के बाहर खड़ा भूखा, बेरोजगार, अशिक्षित जैन युवा, उस संगमरमर से ज्यादा महत्वपूर्ण है। श्वेताम्बर परंपरा संघ को महत्व देती है। संघ यानी साथ चलना। अगर संघ का एक सदस्य पीछे छूट जाए, तो पूरी यात्रा अधूरी है। बोली नहीं, बदलाव का मंत्र यही है- पैसा वहीं लगे जहां से अगला महावीर, अगला आर्य सुधर्मा, अगला वैज्ञानिक, अगला उद्यमी निकले। धर्म वो नहीं जो दीवारों को सोने से मढ़ दे। धर्म वो है जो इंसान के भविष्य को रोशन कर दे। क्योंकि अंत में तीर्थंकर भी यही पूछेंगे-मेरे नाम पर कितने दीप जलाए? नहीं। मेरे बताए रास्ते पर कितने जीवन संवारे? तो फैसला हमें करना है- पत्थर पूजने हैं या भविष्य गढ़ने है ? आरती की बोली लगानी है या आत्मनिर्भरता की नींव रखनी है? जवाब मंदिर की घंटियों में नहीं, एक बच्चे की मुस्कान में मिलेगा।













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