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तीर्थंकरों के वर्णों का वर्णन सुन भावविभोर हुए भक्त : आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने बताया तीर्थंकर 24 ही क्यों? 


30 मई तक धर्म संवर्धन संस्कृति शिविर लगाया गया है। इसमें आचार्य श्री वर्धमान सागर जी, मुनि श्री हितेंद्र सागर जी, श्री प्रभव सागर जी, श्री मुमुक्षु सागर जी, आर्यिका देवर्धि मति, श्री पद्मयशमति सहित अनेक साधुओं द्वारा तत्व तत्वार्थ सूत्र, छहढ़ाला ,धार्मिक संस्कार प्रथम एवं द्वितीय भाग, भक्तामर स्त्रोत,द्रव्य संग्रह आदि धार्मिक विषयों पर शिक्षण शिविर में उपदेश दिया जा रहा है। जयपुर से पढ़िए, डॉ.राजेश पंचोलिया की खबर…


जयपुर। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी चंद्रप्रभ जिनालय चंद्रपुरी बड़ के बालाजी में 36 साधुओं सहित ग्रीष्मकालीन वाचना के लिए विराजित हैं। श्रावक-श्राविकाओं की भावना रहती हैं कि आचार्य संघ का सानिध्य अधिक से अधिक मिले। इसके उपाय में धार्मिक अनुष्ठान, कार्यक्रम करते हैं ताकि संत समागम अधिक से अधिक समय मिले। जब से गुरुदेव पधारे हैं। नियमित धार्मिक आयोजन हो रहे हैं। सुनीता,भागचंद चूड़ीवाल ने बताया कि 21 से 30 मई तक धर्म संवर्धन संस्कृति शिविर लगाया गया है। इसमें आचार्य श्री वर्धमान सागर जी, मुनि श्री हितेंद्र सागर जी, श्री प्रभव सागर जी, श्री मुमुक्षु सागर जी, आर्यिका देवर्धि मति, श्री पद्मयशमति सहित अनेक साधुओं द्वारा तत्व तत्वार्थ सूत्र, छहढ़ाला ,धार्मिक संस्कार प्रथम एवं द्वितीय भाग, भक्तामर स्त्रोत,द्रव्य संग्रह आदि धार्मिक विषयों पर शिक्षण शिविर में उपदेश दिया जा रहा है। जिसमें भक्तों द्वारा भाग लिया जा रहा है। जोबनेर मंगलम सिटी, श्याम नगर, मालवीय नगर आदि से सभी उम्र के भक्त शामिल हो रहे हैं। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने तीर्थंकर के शरीर का वर्ण दोहे के माध्यम से बताया दो गोरे,दो सांवरे, दो हरियल, दो लाल। सोलह प्रतिमा स्वर्ण मई, तिन्हें नवाऊँ भाल।। अर्थात चंद्रप्रभ एवं पुष्पदंत सफेद वर्ण, मुनिसुव्रतनाथ एवं नेमिनाथ श्याम वर्ण/नील वर्ण, पद्मप्रभ एवं वासुपूज्य लाल वर्ण, सुपार्श्वनाथ एवं पार्श्वनाथ हरित वर्ण तथा शेष सोलह तीर्थंकर का पीत वर्ण (तपाए हुए स्वर्ण समान) हैं। सुरेश सबलावत के अनुसार आचार्य श्री ने बताया कि बाहुबली स्वामी ने तपस्या करके केवलज्ञान और फिर मोक्ष प्राप्त किया था। अतः वे भगवान हैं, लेकिन तीर्थंकर नामकर्म प्रकृति का उन्हें न तो बंध था, न उदय।

अतः वे तीर्थंकर नहीं हैं तीर्थंकर 24 ही क्यों? जब ये प्रश्न किया गया तब उनका उत्तर था- इस मान्यता में कोई अलौकिकता नहीं है क्योंकि, लोक में अनेक ऐसे पदार्थ है जैसे- ग्रह, नक्षत्र, राशि, तिथियां और तारागण जिनकी संख्या काल योग से नियत है, तीर्थंकर सर्वाेत्कृष्ट होते हैं। अतः उनके जन्मकाल योग भी विशिष्ट उत्कृष्ट ही होना चाहिए या होते हैं। ज्योतिषाचार्यों का मत है कि प्रत्येक कल्पकाल के दुषमा सुषमा काल में ऐसे उत्तम योग 24 ही पड़ते हैं, जिसमें तीर्थंकरों का जन्म होता है।

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