स्थानीय कमलानगर स्थित श्री महावीर दिगम्बर जैन मंदिर के डी-ब्लॉक परिसर में विराजमान आचार्य श्री निर्भयसागर जी महाराज ससंघ के मंगल सान्निध्य में प्रातःकालीन धर्मसभा में श्रद्धालुओं की विशाल उपस्थिति रही। आगरा से पढ़िए, शुभम जैन की रिपोर्ट…
आगरा। स्थानीय कमलानगर स्थित श्री महावीर दिगम्बर जैन मंदिर के डी-ब्लॉक परिसर में विराजमान आचार्य श्री निर्भयसागर जी महाराज ससंघ के मंगल सान्निध्य में प्रातःकालीन धर्मसभा में श्रद्धालुओं की विशाल उपस्थिति रही। धर्मसभा में आचार्य श्री ने “ऊँ” अर्थात औंकार की महिमा का अत्यंत प्रभावशाली वर्णन करते हुए कहा कि ऊँकार की उत्पत्ति जैन तीर्थंकरों की दिव्य वाणी से हुई है। आचार्य श्री ने कहा कि ऊँ को वैदिक, जैन, ईसाई सहित अनेक दर्शन स्वीकार करते हैं किन्तु, इसकी वास्तविक उत्पत्ति तीर्थंकर पर मात्माओं की वाणी से हुई है। उन्होंने बताया कि ऊँ में अद्भुत आध्यात्मिक शक्ति निहित है। इसके उच्चारण एवं साधना से मनोवांछित फल प्राप्त होते हैं तथा साधक का आत्म संयम निरंतर बढ़ता जाता है। आचार्यश्री ने दैनिक जीवन की आध्यात्मिक दिनचर्या के बारे में कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को प्रातः उठते ही आत्मा से परमात्मा बनने का लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए। उन्होंने कर दर्शन की महिमा बताते हुए कहा कि दोनों हाथों को जोड़कर उनमें 24 तीर्थंकरों का स्मरण करते हुए नवकार मंत्र का जाप करना चाहिए। तत्पश्चात ऊँकार का नाद करना चाहिए। ऊँ अक्षर की व्याख्या करते हुए आचार्य श्री ने कहा कि इसमें तीनों लोक समाहित हैं। अधोलोक का “अ”, ऊर्ध्वलोक का “ऊ” और मध्यलोक का “म”, अर्थात अ $ ऊ $ म = ऊँ। इसी प्रकार पंच परमेष्ठी भी ऊँ में समाहित हैं। अरिहंत का “अ”, अशरीरी सिद्ध का “अ”, आचार्य का “आ”,उपाध्याय का “ऊ” एवं मुनि का “म”, अर्थात अ $ अ $ आ $ ऊ $ म = औंम। इस धर्मसभा का शुभारंभ विमलेश जैन द्वारा मंगलाचरण से हुआ।
पाद प्रक्षालन का सौभाग्य अशोक जैन, राजेश जैन सेठी, प्रदीप जैन पीएनसी एवं अनिल जैन को प्राप्त हुआ। जिनवाणी भेंट जे.सी. जैन, यशपाल जैन एवं दीपचंद जैन द्वारा समर्पित की गई। संचालन समाज के वरिष्ठ सदस्यों द्वारा सुव्यवस्थित रूप से किया गया। इस अवसर पर आगामी धार्मिक गतिविधियों की जानकारी देते हुए बताया गया कि प्रतिदिन सायं 6.30 से 7 बजे तक जिज्ञासा समाधान एवं रात्रि 7 से 7.30 बजे तक पूजन क्रियाओं पर विशेष कक्षा आयोजित की जाएगी। सकल जैन समाज से प्रतिदिन प्रातः 7.30 बजे मंदिर जी के बाहर खुले परिसर में आयोजित होने वाली धर्मसभा में अधिकाधिक संख्या में उपस्थित होने का आग्रह किया गया।













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