जैन धर्म के 24 तीर्थंकरों की श्रेणी में 17वें तीर्थंकर भगवान कुंथुनाथ जी का व्यक्तित्व अत्यंत विलक्षण और प्रेरणादायी है। 18 अप्रैल (वैशाख शुक्ल प्रतिपदा) का दिन जैन समाज के लिए एक महामहोत्सव के समान है, क्योंकि इसी पावन तिथि को प्रभु के जन्म, तप और मोक्ष इन तीन महान कल्याणकों का त्रिवेणी संगम होता है। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल का यह संपादित आलेख…
इंदौर। जैन धर्म के 24 तीर्थंकरों की श्रेणी में 17वें तीर्थंकर भगवान कुंथुनाथ जी का व्यक्तित्व अत्यंत विलक्षण और प्रेरणादायी है। 18 अप्रैल (वैशाख शुक्ल प्रतिपदा) का दिन जैन समाज के लिए एक महामहोत्सव के समान है, क्योंकि इसी पावन तिथि को प्रभु के जन्म, तप और मोक्ष इन तीन महान कल्याणकों का त्रिवेणी संगम होता है। यह दिन न केवल धार्मिक अनुष्ठानों का है, बल्कि स्वयं के भीतर झांकने और संयम के मार्ग पर चलने का संदेश भी देता है।
हस्तिनापुर की पावन धरा पर अवतरण (जन्म कल्याणक)
भगवान कुंथुनाथ जी का जन्म कुरुवंश की ऐतिहासिक नगरी हस्तिनापुर में हुआ था। उनके पिता राजा सूर्यसेन और माता महारानी श्रीकांता थीं। वैशाख शुक्ल प्रतिपदा के दिन जब प्रभु का जन्म हुआ, तब संपूर्ण देवलोक हर्षित हो उठा। जैन आगमों के अनुसार तीर्थंकर के जन्म के समय इंद्रों ने सुमेरु पर्वत पर ले जाकर उनका जन्माभिषेक किया था। कुंथुनाथ जी का व्यक्तित्व दोहरे उत्तरदायित्वों का संगम था। वे न केवल एक तीर्थंकर थे, बल्कि वे छठे चक्रवर्ती भी थे। इसका अर्थ है कि उन्होंने एक विशाल साम्राज्य पर धर्मपूर्वक शासन किया, किंतु उनका हृदय सदैव कमल के समान संसार रूपी जल से निर्लिप्त रहा।
वैराग्य और कठोर साधना (तप कल्याणक)
संसार का वैभव, छः खंडों का साम्राज्य और अतुलनीय शक्ति होने के बाद भी कुंथुनाथ जी का मन आत्मिक शांति की खोज में था। एक दिन संसार की अनित्यता को जानकर उन्होंने दिगंबर दीक्षा धारण करने का संकल्प लिया। हस्तिनापुर के श्सहेतुकश् वन में उन्होंने वैशाख शुक्ल प्रतिपदा के ही दिन दीक्षा ग्रहण की। उनके तप कल्याणक की यह विशेषता है कि उन्होंने घोर तपस्या के माध्यम से इंद्रियों पर विजय प्राप्त की। उनका जीवन हमें सिखाता है कि संयम ही वास्तविक शक्ति है। आज के भागदौड़ भरे युग में, जहां मनुष्य भौतिक सुखों के पीछे भाग रहा है, भगवान कुंथुनाथ का तप हमें एकाग्रता और त्याग की महत्ता समझाता है।
अनंत सुख की प्राप्ति (मोक्ष कल्याणक)
कठोर तप और ध्यान के बल पर प्रभु ने पहले ‘केवलज्ञान’ (संपूर्ण ज्ञान) प्राप्त किया और फिर सम्मेद शिखरजी की पावन पहाड़ियों से वैशाख शुक्ल प्रतिपदा के ही दिन ही निर्वाण प्राप्त कर सिद्ध पद को प्राप्त हुए। एक ही तिथि पर जन्म, दीक्षा और मोक्ष का होना आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत दुर्लभ और महत्वपूर्ण माना जाता है।
जैन मंदिरों में भक्ति का उल्लास-पूजन और विधान
18 अप्रैल को देश-दुनिया के समस्त दिगंबर जैन मंदिरों में भक्ति की बयार बहेगी। इस विशेष अवसर पर भक्तगण निम्नलिखित धार्मिक क्रियाओं के माध्यम से अपनी श्रद्धा अर्पित करेंगे। प्रभु के चरणों में पवित्र जल से अभिषेक कर विश्व शांति की कामना की जाएगी। मोक्ष कल्याणक के प्रतीक स्वरूप मंदिरों में भव्य निर्वाण लाडू चढ़ाया जाएगा, जो आत्मा की पूर्णता का प्रतीक है। भक्ति भाव के साथ निर्वाण कांड का पाठ किया जाएगा, जिसमें सिद्धक्षेत्रों की वंदना होती है। अष्ट द्रव्यों (जल, चंदन, अक्षत, पुष्प, नैवेद्य, दीप, धूप, फल) से प्रभु की सामूहिक आराधना की जाएगी।
आज के परिप्रेक्ष्य में भगवान कुंथुनाथ की शिक्षाएं
भगवान कुंथुनाथ जी का जीवन जियो और जीने दो के सिद्धांत का जीवंत उदाहरण है। उनके नाम में ‘कुंथु’ शब्द छोटे जीवों की रक्षा की ओर भी संकेत करता है, जो अहिंसा के सूक्ष्म पालन को दर्शाता है। उनके कल्याणक हमें सिखाते हैं कि इच्छाओं पर नियंत्रण ही सुखी जीवन की कुंजी है। जिस प्रकार उन्होंने तप में एकाग्रता दिखाई, वैसे ही हमें अपने लक्ष्यों के प्रति समर्पित होना चाहिए। संचय से अधिक सुख विसर्जन और त्याग में है। भगवान कुंथुनाथ जी का यह त्रिकल्याणक महोत्सव संपूर्ण मानवता को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला मार्ग प्रशस्त करे, इसी मंगल भावना के साथ समस्त जैन समाज इस गौरवशाली दिवस को उल्लासपूर्वक मनाता है।













Add Comment