सफलता केवल परिश्रम का परिणाम नहीं होती, उसके पीछे विवेक, संयम और सही समय पर सही निर्णय लेने की क्षमता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। विश्व के अनेक महान चिंतकों ने इस तथ्य को स्वीकार किया है कि योजनाओं की गोपनीयता ही सफलता की आधारशिला है। आज के समय में व्यक्ति अपने विचारों और योजनाओं को शीघ्र साझा करने की प्रवृत्ति रखता है। आज पढ़िए, अंशुल जैन शास्त्री का यह आलेख…
मुरैना/सांगानेर। सफलता केवल परिश्रम का परिणाम नहीं होती, उसके पीछे विवेक, संयम और सही समय पर सही निर्णय लेने की क्षमता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। विश्व के अनेक महान चिंतकों ने इस तथ्य को स्वीकार किया है कि योजनाओं की गोपनीयता ही सफलता की आधारशिला है। आज के समय में व्यक्ति अपने विचारों और योजनाओं को शीघ्र साझा करने की प्रवृत्ति रखता है। उत्साह में वह अपने लक्ष्य दूसरों के सामने रख देता है, किंतु यही जल्दबाज़ी कई बार उसके प्रयासों को कमजोर कर देती है। अधूरी या प्रारंभिक योजनाएँ जब सार्वजनिक हो जाती हैं, तो वे अनावश्यक आलोचना, संदेह और व्यवधान को आमंत्रित करती हैं। हिंदी साहित्य के महान कवि अब्दुर्रहीम खानखाना ने स्पष्ट कहा है कि अपनी योजनाओं और मान-सम्मान से जुड़ी बातों को सदैव गुप्त रखना चाहिए। चाणक्य भी यही बताते हैं कि मन में विचारित कार्य को वाणी से प्रकट करने के बजाय उसे मौन रहकर क्रियान्वित करना ही बुद्धिमानी है। तुलसीदास ने संयम और समय की महत्ता को रेखांकित किया है, जबकि स्वामी विवेकानंद ने विचारों को कर्म में परिवर्तित करने पर बल दिया है।
सच्चे कार्य शांत और निरंतर प्रयासों से ही सिद्ध होते हैं,
पाश्चात्य चिंतन भी इसी दिशा में मार्गदर्शन देता है। स्टीफन कॉवे के अनुसार लक्ष्य पर मौन समर्पण आवश्यक है, वहीं रॉबर्ट ग्रीन अपनी पुस्तक द 48 लॉ ऑफ पावर में कन्सील योर इन्टेशन्स का सिद्धांत प्रस्तुत करते हैं, जो योजनाओं की गोपनीयता को शक्ति का आधार मानता है। महात्मा गांधी के विचार भी यही दर्शाते हैं कि सच्चे कार्य शांत और निरंतर प्रयासों से ही सिद्ध होते हैं, न कि उनके प्रचार से। आज की प्रतिस्पर्धात्मक दुनिया में यह और भी आवश्यक हो गया है कि व्यक्ति अपने लक्ष्यों को सीमित दायरे में रखें और उन्हें धैर्यपूर्वक पूरा करें क्योंकिए हर योजना को सार्वजनिक करना समझदारी नहीं, बल्कि कई बार अपनी ही राह में बाधाएँ खड़ी करना होता है।













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