धर्माचार्य कनक नंदीजी जी ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कि यह आत्मा कर्ता है। जो क्रिया का कर्ता है वह कर्ता है.। बिना कर्ता के कोई भी कार्य नहीं होता है जीव अभिन्न षटकारक है। डडूका से अजीत कोठिया की रिपोर्ट…
डडूका। धर्माचार्य कनक नंदीजी जी ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कि यह आत्मा कर्ता है। जो क्रिया का कर्ता है वह कर्ता है.। बिना कर्ता के कोई भी कार्य नहीं होता है जीव अभिन्न षटकारक है। स्वात्मा में स्वात्मा की आराधना की जाती है। निश्चय से महान कर्ता सिद्ध भगवान है उन्होंने अपने समस्त कर्मों को नष्ट करके अनंत चतुष्टय प्राप्त किया है। सबसे महान भोक्ता भी सिद्ध भगवान है क्योंकि, वह अपने अनंत बल के आधार पर अनंत सुख का भोग कर रहे हैं। सिद्ध भगवान में उत्पाद व्यय धौव्य भी निरंतर हो रहा है। शुद्ध आत्मा में शुद्ध परिणामन हो रहा है। सबसे श्रेष्ठ दृष्टा भी सिद्ध भगवान है। संसार के सभी जीवों को उनके पाप पुण्य को प्रति समय वह देखते हैं परंतु किसी के प्रति राग नहीं होने से ना किसी के सुख से सुखी ना किसी के दुख से दुखी होते हैं। संसार के सभी कार्य उन्होंने कर लिए हैं, उनके लिए कुछ करना बाकी नहीं है इसलिए कृतकृत्य है। वह न किसी को कुछ देते हैं ना किसी से कुछ लेते हैं। उनकी भक्ति आराधना पूजा से भक्तों को स्वयंमेव फल मिलता है।
कर्ता के बिना ना पाप न पुण्य, न स्वर्ग ना मोक्ष
कर्म का फल कर्ता को मिलता है पाप का करता भी तुम स्वयं हो और पुण्य का कर्ता भी तुम स्वयं हो। अभिन्न षटकारक हो। तुम्हारी आत्मा है तो संसार के सभी द्रव्य तुम्हारे काम के हैं यदि जीव द्रव्य ही नहीं तो अन्य द्रव्य कोई कार्यकारी नहीं। व्यवहार से कर्ता हो। भोज्य वस्तु से ही भोजन बनता है पानी फ्रीज के माध्यम से बर्फ बन जाता है। पानी ही पानी द्वारा परिणमन करके बर्फ बनता है। इस प्रकार आत्मा ही आत्मा द्वारा आत्मा के लिए ,आत्मा की साधना करके आत्मा को प्राप्त करता है। कर्ता के बिना ना पाप न पुण्य, न स्वर्ग ना मोक्ष। भाव ही प्रमुख है पुण्य भाव शुभ भाव करने से स्वर्ग मोक्ष मिलेगा तथा पाप भाव अशुभ भाव करने से नरक तिर्यच के दुख प्राप्त होंगे। अच्छा भाव का फल अच्छा स्वयं को ही मिलता है।
सभी जीवों से गुणों में भारी है, अतः गुरु है
जिन भावना से युक्त भव्य जीव ज्ञानावरणीय दर्शनावरणीय मोहनीय अंतराय आदि घाति कर्मों को नष्ट करके अनंत ज्ञान अनंत दर्शन अनंत सुख अनंत वीर्य ऐसे चार चतुष्टय प्रगट करता हैं। मैं ही कर्म, मैं ही कर्ता मैं ही भोक्ता , मैं ही पतित,मैं ही पावन, मैं ही धर्म, मै ही अधर्म। ज्ञानी शिव परमेष्ठी बनते हैं। परम पद पर स्थित होने के कारण परमेष्ठी कहते हैं। समस्त पदार्थों के ज्ञाता होने से सर्वज्ञ है। समस्त विश्व में उनका ज्ञान फैला हुआ है अतः विष्णु है। केवल ज्ञान होने के बाद भगवान का मुख चारों दिशाओं में दिखता है। अतः ब्रह्मा है। सभी जीवों से गुणों में भारी है। अतः गुरु है। उनके सभी कार्य सिद्ध हो गए हैं अतः सिद्ध हैं। मुनि श्री सुविज्ञ सागर जी गुरुदेव ने आचार्य श्री द्वारा रचित कविता ‘शरीर रहित यदि मैं होता समस्याओं से मैं रहित होता। राग द्वैष, मोह से रहित होता. सत्य, चित्त आनंद होता।’ से मंगलाचरण किया। यह जानकारी विजयलक्ष्मी कमल कुमार पुनर्वास कॉलोनी सागवाड़ा ने दी।













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