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अष्टान्हिका महापर्व का दूसरा दिन : सिद्धों की आराधना हमारे जीवन की सबसे बड़ी साधना – प्रमुख सागर महाराज


भगवान महावीर धर्मस्थल में अष्टान्हिका पर्व के उपलक्ष्य में आयोजित श्री 1008 सिद्धचक्र महामंडल विधान के दूसरे दिन मंगलवार को आचार्य श्री प्रमुख सागर महाराज ने उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि सिद्धों की आराधना-उपासना हमारी जीवन की सबसे बड़ी साधना है। इस साधना के लिए परमात्मा और पूजन का साधन हमें जुटाना पड़ता है। पढ़िए सुनील कुमार सेठी की रिपोर्ट…


गुवाहाटी। स्थानीय एम.एस. रोड स्थित भगवान महावीर धर्मस्थल में अष्टान्हिका पर्व के उपलक्ष्य में आयोजित श्री 1008 सिद्धचक्र महामंडल विधान के दूसरे दिन मंगलवार को आचार्य श्री प्रमुख सागर महाराज ने उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि सिद्धों की आराधना-उपासना हमारी जीवन की सबसे बड़ी साधना है। इस साधना के लिए परमात्मा और पूजन का साधन हमें जुटाना पड़ता है।

उन्होंने कहा कि हमें अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देनी चाहिए लेकिन वह संस्कार से रहित न हो। आजकल के बच्चे पढ़े-लिखे तो हो रहे हैं, पर वह आदरवान, विनयवान, संस्कारवान आदि नहीं हैं। आचार्य श्री ने सुर सुंदरी और मैना सुंदरी की कहानी को लेकर अपने मन की बात कही। उन्होंने कहा कि सुर सुंदरी ने बाहर जगत को सीख लिया लेकिन अंदर जगत से अधूरी रह गई। वहीं मैना सुंदरी ने जैन गुरु से पढ़ा और उसने जान लिया कि जब तक हम अध्यात्म में नहीं आएंगे, तब तक ही हमें क्षणिक सुख मिलेगा और उस सुख में हमारा कल्याण नहीं है। शास्वत सुख को प्राप्त करने के लिए आध्यात्मिक शिक्षा बहुत जरूरी है।


चढ़ाए 16 अर्घ्य

विधान के दूसरे दिन आचार्य श्री प्रमुख सागर महाराज ससंघ के निर्देशन में भगवान की शांति धारा, अभिषेक के साथ इंद्र- इंद्राणी सहित विधान के प्रमुख पात्रों द्वारा संगीतमय स्वर लहरियों के साथ पूजा अर्चना कर विधान के 16 अर्घ्य चढ़ाए गए।

इस अवसर पर संध्या कालीन आरती के पश्चात श्री दिगंबर जैन महिला समिति द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। जिसमें काफी संख्या में समाज के सदस्य उपस्थित थे। यह जानकारी समाज के प्रचार प्रसार विभाग के मुख्य संयोजक ओम प्रकाश सेठी एवं सह संयोजक सुनील कुमार सेठी ने दी।

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