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अपने नगरों में क्यों आवश्यक हैं धार्मिक शिक्षण शिविर : जिस समाज में संस्कार जीवित रहते हैं, ‎वहीं धर्म जीवित रहता है ‎और जहाँ धर्म जीवित रहता है 


जैन धर्म, ‎एक ऐसा धर्म, जो अपनी प्राचीनता, महानता और अद्वितीय सिद्धांतों के कारण सम्पूर्ण विश्व में सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। ‎जिसके प्रत्येक आचार्य, प्रत्येक संत और प्रत्येक शास्त्र मानव जीवन को संयम, करुणा और आत्मकल्याण की दिशा प्रदान करते हैं। ‎मुरैना/सांगानेर से पढ़िए, अंशुल जैन शास्त्री का आलेख…प्रस्तुति…मनोज जैन नायक की। 


मुरैना/सांगानेर। जैन धर्म, ‎एक ऐसा धर्म, जो अपनी प्राचीनता, महानता और अद्वितीय सिद्धांतों के कारण सम्पूर्ण विश्व में सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। ‎जिसके प्रत्येक आचार्य, प्रत्येक संत और प्रत्येक शास्त्र मानव जीवन को संयम, करुणा और आत्मकल्याण की दिशा प्रदान करते हैं। ‎परंतु आज का सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या आने वाली नई पीढ़ी इस अमूल्य धरोहर को जान पा रही है? ‎क्या उन्हें जिनवाणी का ज्ञान है? ‎क्या वे णमोकार मंत्र का महत्व समझते हैं? ‎क्या उन्हें अभिषेक, शांतिधारा, पूजा-विधि और जैन सिद्धांतों का बोध है? ‎यदि उत्तर “नहीं” है तो यह केवल एक कमी नहीं, बल्कि भविष्य के लिए एक गंभीर संकेत है। ‎नई पीढ़ी ही किसी भी समाज, संस्कृति और धर्म का भविष्य होती है। ‎यदि वही अपने धर्म से अपरिचित रह जाए, तो धीरे-धीरे परंपराएं केवल पुस्तकों तक सीमित होकर रह जाती हैं। ‎फिर धर्म जीवन का मार्ग नहीं, केवल नाममात्र की पहचान बनकर रह जाता है। ‎आज स्थिति यह है कि अनेक लोग जैन धर्म के मूल सिद्धांतों से दूर होते जा रहे हैं। ‎रात्रि भोजन, आवश्यक मर्यादाओं की उपेक्षा और धार्मिक ज्ञान से दूरी सामान्य बात बनती जा रही है। ‎ऐसे समय में केवल चिंतन पर्याप्त नहीं, बल्कि जागरण आवश्यक है। ‎और यही जागरण “शिविर” के माध्यम से संभव हो सकता है। अपने नगर, अपने मंदिर और अपने समाज में लगने वाला एक छोटा-सा शिविर केवल कुछ दिनों का आयोजन नहीं होता, ‎बल्कि वह नई पीढ़ी के भीतर संस्कारों का बीजारोपण होता है। ‎वहीं बालक पहली बार समझता है कि उसका धर्म क्या है। ‎वहीं उसे ज्ञात होता है कि शास्त्र केवल पढ़ने की वस्तु नहीं, बल्कि जीवन को श्रेष्ठ बनाने का आधार हैं। ‎वहीं उसे संयम, अनुशासन, पूजा, मंत्र और संस्कारों का वास्तविक अर्थ समझ आता है।

‎धन समाप्त हो सकता है, ‎परंतु संस्कार नहीं 

माता-पिता अपने बच्चों के लिए धन, संपत्ति और सुख-सुविधाएँ जुटाने में जीवन लगा देते हैं। ‎परंतु सत्य यह है कि धन केवल कुछ समय तक सहारा देता है, ‎जबकि धर्म से प्राप्त संस्कार जीवनभर मनुष्य का मार्गदर्शन करते हैं। ‎धन समाप्त हो सकता है, ‎परंतु संस्कार कभी समाप्त नहीं होते। ‎इसलिए प्रत्येक माता-पिता का यह कर्तव्य है कि वे अपने बच्चों को केवल भौतिक सुविधाएँ ही नहीं, बल्कि धर्म का प्रकाश भी दें। ‎यदि आने वाली पीढ़ी को अपने धर्म का ज्ञान ही न हो, तो यह केवल बच्चों की कमी नहीं, बल्कि समाज की सबसे बड़ी विफलता होगी। ‎अपने नगर में शिविर लगवाना केवल एक आयोजन करवाना नहीं है, ‎बल्कि अपने धर्म, अपनी संस्कृति और अपनी आने वाली पीढ़ी के भविष्य को सुरक्षित करना है। ‎क्योंकि जिस समाज में संस्कार जीवित रहते हैं, ‎वहीं धर्म जीवित रहता है ‎और जहाँ धर्म जीवित रहता है ‎वहीं समाज का भविष्य उज्ज्वल बनता है। ‎इसलिए आवश्यक है कि हमारे मंदिरों में, हमारे गाँवों में और हमारे नगरों में शिविर अवश्य लगें, ‎ताकि जैन धर्म केवल सीमित समाज तक न रह जाए, ‎अपितु जन-जन तक पहुँचे, ‎और प्रत्येक व्यक्ति उसके सिद्धांतों को जानकर अपने जीवन को श्रेष्ठ बना सके। ‎शिविर केवल शिक्षा नहीं देते, ‎वे पीढ़ियों का भविष्य गढ़ते हैं।

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