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दोहों का रहस्य -35 संशय से मुक्त होकर श्रद्धा रखो, तभी आत्मिक शांति और सच्चा ज्ञान मिलेगा : जहां अहंकार है, वहां संकट, दुःख और विनाश निश्चित है


दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की पैंतीसवीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…


जहां आपा तहां आपदा, जहां संशय तहां रोग।
कह कबीर यह क्यों मिटे, चारों धीरज रोग।

कबीर दास जी इस दोहे के माध्यम से जीवन के सबसे महत्वपूर्ण सत्य को उजागर कर रहे हैं। अहंकार और संशय ही मानव जीवन के सबसे बड़े रोग हैं, और इनका इलाज केवल धैर्य, संतोष, श्रद्धा और आत्मज्ञान से संभव है।
“आपा” का अर्थ अहंकार (मैं, मेरा, मेरा वर्चस्व) से है। जहां अहंकार होता है, वहां संकट, दुःख और विनाश निश्चित रूप से आता है।
जब व्यक्ति स्वयं को सबसे बड़ा मानता है, तो वह दूसरों को तुच्छ समझने लगता है। इससे संबंध बिगड़ते हैं और सामाजिक विघटन होता है।
अहंकारी व्यक्ति अपनी गलती स्वीकार नहीं करता और आत्ममुग्धता में जीता है, जिससे वह सीखने और सुधारने की क्षमता खो देता है। इस बात को ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो जितने भी बड़े राजा या शासक अपने अहंकार में अंधे हो गए, उनका पतन निश्चित हुआ (जैसे रावण, दुर्योधन, हिटलर, आदि)।
अतः अहंकार छोड़कर विनम्र बनो, तभी जीवन में सुख और उन्नति संभव है।
संशय से मुक्त होकर श्रद्धा रखो, तभी आत्मिक शांति और सच्चा ज्ञान मिलेगा।
धैर्य, संतोष, श्रद्धा और समर्पण से ही जीवन में सच्ची खुशी, मानसिक स्वास्थ्य और आध्यात्मिक उत्थान संभव है।
कबीर जी का यह दोहा हमें मानव जीवन के सबसे बड़े सत्य से परिचित कराता है और हमें जीवन को सही दिशा में जीने की प्रेरणा देता है।

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