दोहों का रहस्य समाचार

दोहों का रहस्य -142 यदि मनुष्य में प्रेम नहीं, तो उसमें मनुष्यता नहीं : प्रेम करना ही सच्चे अर्थों में जीवन जीना है


दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की 142वीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…


“जा घट प्रेम न संचरे, सो घट जान समान।

जैसे खाल लुहार की, सांस लेतू बिन प्रान॥”


कबीर कहते हैं — जिस हृदय में प्रेम नहीं है,

वह हृदय जीवित होते हुए भी मृत के समान है।

जिस शरीर में प्रेम का संचार नहीं,

वह केवल एक बोझ है — जैसे लुहार की मोटी चमड़ी जो साँस तो लेती है,

पर उसमें जीवन का स्पंदन नहीं होता।

प्रेम ही वह शक्ति है जो आत्मा को परमात्मा से जोड़ती है।

बिना प्रेम के ईश्वर को पाना संभव नहीं,

क्योंकि ईश्वर प्रेम का ही स्वरूप है।

प्रेमहीन जीवन, यद्यपि सांसें ले रहा हो,

फिर भी वह अंदर से रिक्त, निर्जीव और अंधकारमय होता है।

आज के समाज में अनेक लोग धन, पद और प्रतिष्ठा तो रखते हैं,

परन्तु भीतर से प्रेम, करुणा और संवेदना से शून्य होते हैं।

ऐसे लोग दूसरों के दुख-दर्द को समझने में असमर्थ रहते हैं —

उनका हृदय कठोर और आत्मकेन्द्रित हो जाता है।

कबीर स्पष्ट करते हैं कि:

ऐसे प्रेमविहीन जीवन केवल देह की उपस्थिति है — आत्मा का नहीं।

वह जीवन समाज को कोई प्रकाश नहीं देता,

न ही आत्मा को कोई उन्नति।

यह दोहा हमें एक गहरी सीख देता है:

“यदि मनुष्य में प्रेम नहीं, तो उसमें मनुष्यता नहीं।”

सिर्फ सांस लेना, जीवित होने का प्रमाण नहीं है।

प्रेम करना ही सच्चे अर्थों में जीवन जीना है।

जिसमें प्रेम नहीं, वह देह होकर भी केवल एक शून्य ढांचा है।

प्रेम ही जीवन की ज्योति है,

वह ही ईश्वर है, वह ही सत्य है, वह ही मुक्ति का मार्ग है।

प्रेम ही प्राण है — वही ईश्वर है, वही जीवन है।

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