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विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य पर हो राष्ट्रीय विमर्श : शिक्षा व्यवस्था के मानवीयकरण की मांग, राहुल गांधी को श्रमण डॉ. पुष्पेन्द्र का पत्र


देश में प्रतियोगी परीक्षाओं के बढ़ते दबाव, विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था के मानवीयकरण को लेकर श्रमण डॉ. पुष्पेन्द्र ने लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी को खुला पत्र लिखकर राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक विमर्श एवं ठोस नीतिगत पहल की आवश्यकता पर बल दिया है। कोटो से पढ़िए, यह रिपोर्ट…


कोटा। देश में प्रतियोगी परीक्षाओं के बढ़ते दबाव, विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था के मानवीयकरण को लेकर श्रमण डॉ. पुष्पेन्द्र ने लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी को खुला पत्र लिखकर राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक विमर्श एवं ठोस नीतिगत पहल की आवश्यकता पर बल दिया है। उन्होंने कहा कि यह विषय किसी दल या सरकार का नहीं, बल्कि देश के भविष्य और करोड़ों विद्यार्थियों के जीवन से जुड़ा राष्ट्रीय प्रश्न है। श्रमण डॉ. पुष्पेन्द्र ने अपने पत्र में कहा कि राजस्थान के कोटा में विद्यार्थियों के साथ राहुल गांधी का संवाद उन लाखों छात्रों की पीड़ा को राष्ट्रीय मंच देने का प्रयास था, जो वर्षों से प्रतियोगी परीक्षाओं, अंकों की होड़ और सामाजिक अपेक्षाओं के दबाव में मानसिक तनाव का सामना कर रहे हैं। उन्होंने इस विषय को राष्ट्रीय बहस का केंद्र बनाने के लिए राहुल गांधी के प्रति आभार भी व्यक्त किया।

समाज की अपेक्षाएं उनके मानसिक तनाव को और बढ़ा देती हैं

डॉ. पुष्पेन्द्र ने कहा कि वर्तमान शिक्षा व्यवस्था बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण की अपेक्षा परिणाम और प्रतिस्पर्धा पर अधिक केंद्रित होती जा रही है। परीक्षा में अपेक्षित सफलता न मिलने पर अनेक विद्यार्थी स्वयं को असफल मान लेते हैं जबकि, परिवार और समाज की अपेक्षाएं उनके मानसिक तनाव को और बढ़ा देती हैं। यही स्थिति कई बार अवसाद और आत्महत्या जैसी दुखद घटनाओं का कारण बनती है। पत्र में उन्होंने कहा कि यदि शिक्षा बच्चों के चेहरे की मुस्कान छीन ले, यदि अंक उनके जीवन से अधिक मूल्यवान हो जाएं और सफलता केवल रैंक एवं प्रतिशत तक सीमित रह जाए तो ऐसी व्यवस्था पर गंभीर पुनर्विचार होना चाहिए।

आत्महत्या-निवारण की प्रभावी व्यवस्था अनिवार्य हो

श्रमण डॉ. पुष्पेन्द्र ने शिक्षा के मानवीयकरण की आवश्यकता बताते हुए कहा कि शिक्षा ऐसी हो जो बच्चों को केवल सफल नहीं, बल्कि संवेदनशील, आत्मविश्वासी, करुणाशील और जीवन के प्रति आशावान बनाए। उन्होंने यह भी कहा कि बच्चों की पहचान उनके अंकों से नहीं, बल्कि उनके संस्कार, व्यक्तित्व और सपनों से होनी चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि इस विषय पर संसद, शिक्षाविदों, मनोवैज्ञानिकों, अभिभावकों, विद्यार्थियों और नीति-निर्माताओं की सहभागिता से राष्ट्रीय संवाद प्रारम्भ किया जाए। साथ ही देश के प्रत्येक विद्यालय, महाविद्यालय और कोचिंग संस्थान में मनोवैज्ञानिक परामर्श, तनाव प्रबंधन तथा आत्महत्या-निवारण की प्रभावी व्यवस्था अनिवार्य बनाई जाए।

समयबद्ध और गंभीर पहल हो

अपने पत्र में उन्होंने कहा कि भारत का भविष्य केवल तकनीकी रूप से दक्ष युवाओं पर नहीं, बल्कि मानसिक रूप से स्वस्थ, आत्मविश्वासी और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखने वाली युवा पीढ़ी पर निर्भर करता है। इसलिए शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि जीवन मूल्यों से युक्त नागरिक तैयार करना होना चाहिए। श्रमण डॉ. पुष्पेन्द्र ने कहा कि यदि इस दिशा में समयबद्ध और गंभीर पहल होती है, तो यह शिक्षा व्यवस्था में ऐतिहासिक परिवर्तन का आधार बनेगी। उन्होंने कहा कि हर बच्चे का जीवन किसी भी परीक्षा, किसी भी अंक और किसी भी रैंक से कहीं अधिक मूल्यवान है।

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