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15वें तीर्थंकर भगवान धर्मनाथ जी का गर्भ कल्याणक 15 अप्रैल को: तिथि के अनुसार वैशाख कृष्ण त्रयोदशी को आता है


जैन धर्म के 15वें तीर्थंकर भगवान धर्मनाथ जी का गर्भ कल्याणक 15 अप्रैल को मनाया जाएगा। तिथि के अनुसार वैशाख कृष्ण त्रयोदशी को आता है। दिगंबर जैन मंदिरों में विशेष अनुष्ठान, विधान आदि किए जाएंगे। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित और संपादित प्रस्तुति…


इंदौर। जैन धर्म के 15वें तीर्थंकर भगवान धर्मनाथ जी का गर्भ कल्याणक 15 अप्रैल को मनाया जाएगा। तिथि के अनुसार वैशाख कृष्ण त्रयोदशी को आता है। दिगंबर जैन मंदिरों में विशेष अनुष्ठान, विधान आदि किए जाएंगे। जैन धर्म के 15वें तीर्थंकर भगवान धर्मनाथ जी का गर्भ कल्याणक महोत्सव केवल एक तिथि नहीं, बल्कि अध्यात्म और अहिंसा के मार्ग पर बढ़ते एक नए युग का सूत्रपात है। जब संसार मोह-माया के अंधकार में भटक रहा होता है, तब एक तीर्थंकर बालक का माता के गर्भ में आगमन संपूर्ण सृष्टि के लिए मंगलकारी संदेश लेकर आता है। जैन पुराणों के अनुसार भगवान धर्मनाथ जी का जन्म रत्नपुरी की पावन धरा पर हुआ था। उनके गर्भ कल्याणक के दिन से ही चराचर जगत में शांति और हर्ष की लहर दौड़ जाती है। पौराणिक मान्यता है कि तीर्थंकर का जीव जब माता के गर्भ में आता है तो छह माह पूर्व से ही देवलोक से कुबेर रत्नवृष्टि शुरू कर देते हैं।

माता सुव्रता ने सोलह शुभ स्वप्न देखे जो इस बात का प्रतीक थे कि उनके गर्भ में त्रिलोक पूज्य आत्मा ने प्रवेश किया है। महाराज भानु के आंगन में खुशियों का अंबार लग गया और इंद्र की आज्ञा से छप्पन कुमारियों ने माता की सेवा का उत्तरदायित्व संभाला। धर्मनाथ जी का नाम ही ‘धर्म’ के मार्ग को प्रशस्त करने वाला है, जिन्होंने संसार को यह सिखाया कि धर्म ही आत्मा का वास्तविक स्वभाव है।

मंदिरों में भक्ति का सैलाब:विधान और परंपराएं

दिगंबर जैन समाज के मंदिरों में गर्भ कल्याणक के अवसर पर श्रद्धा का ज्वार उमड़ पड़ता है। देश के कोने-कोने में स्थित जिनालयों में सुबह की पहली किरण के साथ ही मंत्रोच्चार गूंजने लगते हैं।

अभिषेक और शांतिधारारू आत्म-विशुद्धि का प्रतीक

उत्सव की शुरुआत भगवान के ‘अभिषेक’ से होती है। स्वर्ण और रजत कलशों से पवित्र जल की धारा जब प्रतिमा पर प्रवाहित होती है तो भक्त अपनी आत्मा के विकारों को धोने का संकल्प लेते हैं। इसके पश्चात शांतिधारा की जाती है। ‘शांतिधारा’ का पाठ न केवल व्यक्तिगत शांति के लिए, बल्कि विश्व कल्याण की भावना से किया जाता है। विश्व शांति की कामना के साथ की जाने वाली शांतिधारा से वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

पूजन और अर्घ्य समर्पण

विशेष पूजा विधान आयोजित किए जाते हैं, जहाँ भक्त अष्टद्रव्य (जल, चंदन, अक्षत, पुष्प, नैवेद्य, दीप, धूप, फल) लेकर भगवान धर्मनाथ जी के गुणों का गान करते हैं। ‘गर्भ कल्याणक अर्घ्य’ के समय पूरा पांडाल ‘जय-जय’ के जयकारों से गुंजायमान हो उठता है।

शांतिधारा पाठ और भजन संध्या

संध्या काल में सामूहिक आरती और भजनों के माध्यम से भगवान की महिमा गाई जाती है। कई स्थानों पर ‘गर्भ कल्याणक’ की नाटिकाएं प्रस्तुत की जाती हैं, जिसमें माता के सोलह स्वप्नों का सुंदर चित्रण होता है।

पूरे देश में भक्ति का दौर

वर्तमान में पूरे भारतवर्ष के दिगंबर जैन मंदिरों में भक्ति का एक विशेष दौर देखने को मिलता है। चाहे वह शिखरजी की पहाड़ियां हों या दक्षिण भारत के प्राचीन बसदी, हर जगह श्रद्धालु केसरिया वस्त्र धारण कर प्रभु भक्ति में लीन नजर आते हैं। भगवान धर्मनाथ जी का यह कल्याणक हमें याद दिलाता है कि संयम और तप की शक्ति से ही मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। इस पावन अवसर पर भक्त केवल कर्मकांड ही नहीं करते, बल्कि भगवान के बताए ’अहिंसा’ और ’अपरिग्रह’ के मार्ग पर चलने का संकल्प भी लेते हैं। भगवान धर्मनाथ जी के चरणों में वंदन करते हुए, यह उत्सव समाज में एकता, शांति और धर्म की प्रभावना का संदेश फैलाता है।

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