भिलुड़ा से आयोजित अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में आचार्य कनक नंदीजी ने कहा कि श्रावक को व्यस्त जीवन में भी दान और पूजा का कर्तव्य निभाना चाहिए। आहार दान को सर्वोत्तम बताते हुए उन्होंने भावपूर्ण पूजा पर जोर दिया। अजित कोठिया
बांसवाड़ा । अजीत कोठिया डडूका की रिपोर्ट के अनुसार, सिद्धांत चक्रवर्ती वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी गुरुदेव ने शिवगौरी आश्रम, भिलुड़ा से आयोजित अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में फ्रांस से श्रावक श्रेयांस की जिज्ञासा का समाधान किया।
उन्होंने सरल भाषा में समझाया कि आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में भी श्रावक को अपना मुख्य कर्तव्य—दान और पूजा—कभी नहीं छोड़ना चाहिए।
दान का महत्व
आचार्य श्री ने बताया कि गृहस्थ जीवन में अनेक प्रकार के पाप अनजाने में हो जाते हैं। इन पापों को धोने के लिए उत्कृष्ट अतिथि साधुओं को आहार दान देना बेहद जरूरी है।
उन्होंने कहा कि आहार दान से साधु और श्रावक दोनों को लाभ होता है—साधु की तपस्या बढ़ती है और श्रावक का मन शुद्ध होता है।
पूजा का सही अर्थ
उन्होंने स्पष्ट किया कि मंदिर में अभिषेक और पूजा करना जरूरी है, लेकिन उससे भगवान को नहीं, बल्कि श्रावक को ही लाभ मिलता है।
मूर्ति को न तो भूख लगती है और न ही उसे किसी सेवा की आवश्यकता होती है, इसलिए पूजा का असली फल तभी मिलता है जब वह पवित्र भाव से की जाए।
आहार दान सर्वोत्तम क्यों?
आचार्य श्री ने कहा कि आहार दान को सबसे श्रेष्ठ दान माना गया है क्योंकि इससे साधु स्वस्थ रहते हैं, स्वाध्याय करते हैं और ध्यान में प्रगति करते हैं। यही साधना आगे चलकर मोक्ष का मार्ग बनाती है।
भाव पूजा का महत्व
उन्होंने बताया कि पूजा में सबसे पहले भाव पूजा आती है, उसके बाद द्रव्य पूजा। अगर भाव शुद्ध नहीं है, तो पूजा का कोई विशेष फल नहीं मिलता।
आधुनिक पीढ़ी पर विश्वास
आचार्य श्री ने कहा कि आज की युवा पीढ़ी अधिक समझदार, उदार और सेवा भावना रखने वाली है। यदि उसे सही दिशा मिले, तो वह धर्म को अच्छे से अपना सकती है।
प्रकृति भी सिखाती है दान
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि प्रकृति भी हमें दान की प्रेरणा देती है—वह बिना स्वार्थ के अन्न, जल, वायु और औषधि प्रदान करती है।
जानकारी
इस वेबीनार की जानकारी विजयलक्ष्मी गोदावत, सागवाड़ा द्वारा दी गई।













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