आर्यिका सुपार्श्वमति जी का 10 अप्रैल को अंतर्विलय समाधि दिवस है। आपका जन्म नागौर जिले के मेंनसर ग्राम में विक्रम संवत 1985 फागुन शुक्ल नवमी को हुआ। जन्म नाम भंवरी रखा गया। विक्रम संवत 2014 भाद्र शुक्ल षष्ठी पर भगवान सुपार्श्वनाथ के गर्भ कल्याणक दिवस प्रथम पट्टाधीश श्री वीर सागर जी महाराज ने आपको राणा जी की नसिया जयपुर चुलगिरी में आर्यिका दीक्षा प्रदान कर आर्यिका श्री सुपार्श्व मति बनाया। इंदौर से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर…
इंदौर। आर्यिका सुपार्श्वमति जी का 10 अप्रैल को अंतर्विलय समाधि दिवस है। आपका जन्म नागौर जिले के मेंनसर ग्राम में विक्रम संवत 1985 फागुन शुक्ल नवमी को हुआ। जन्म नाम भंवरी रखा गया। विक्रम संवत 2014 भाद्र शुक्ल षष्ठी पर भगवान सुपार्श्वनाथ के गर्भ कल्याणक दिवस प्रथम पट्टाधीश श्री वीर सागर जी महाराज ने आपको राणा जी की नसिया जयपुर चुलगिरी में आर्यिका दीक्षा प्रदान कर आर्यिका श्री सुपार्श्व मति बनाया। आपने अनेक ग्रंथों की रचना की। जीवन काल में अनेक वर्षायोग में अनेक राज्यों विशेष कर आसाम आदि में चैत्यालयों की स्थापना आपकी प्रेरणा से हुई। आपने अनेक दीक्षा, महाव्रत अणुव्रत अनेक भव्य जीवों को प्रदान कर उनका मानव जीवन सार्थक किया।
अदभुत संयोग
आर्यिका श्री सुपार्श्व मति माताजी ने सीकर में वर्ष 2001 का चातुर्मास पूर्ण कर लगभग 500 किमी की दूरी तय कर नंदनवन धरियावद में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज के दर्शन किए। संयोग था आर्यिका श्री विशुद्धमति माताजी की संलेखना समाधि का। तब आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने कहा था कि आज प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी परंपरा के सभी आचार्यों के शिष्य 5 पीढ़ी की उपस्थिति है। आचार्य श्री वीर सागर जी की शिष्या आर्यिका श्री सुपार्श्वमति, आचार्य श्री शिव सागर जी की शिष्या आर्यिका श्री विशुद्ध मति जी, आचार्य श्री धर्म सागर जी के शिष्य हम स्वयं एवं आर्यिका श्री शुभ मति आचार्य श्री अजीत सागर जी की शिष्या आर्यिका श्री चैत्य मति तथा हमारे दीक्षित साधु उपस्थित हैं।
समाधि
आपकी भावना के अनुरूप पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज द्रुत गति से जयपुर की ओर विहार कर रहे थे। आपके स्थिति गंभीर होने पर सिद्ध क्षेत्र सोनागिर से आधुनिक संचार साधनों से संबोधन प्रदान किया। आपकी समाधि बड़के बालाजी जयपुर में 13 अप्रैल 2013 वैशाख कृष्ण अष्टमी को हुई। 14 वंे अंतर्विलय समाधि वर्ष पर बहुत बहुत वंदामि।













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