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चातुर्मास संयम साधना और अहिंसा की उपासना का आत्मिक अनुष्ठान है : पट्टाचार्य विशुद्ध सागर जी के 37वें वर्षायोग का मंगल कलश स्थापना समारोह सम्पन्न


दिल्ली के ऋषभ विहार में पट्टाचार्य श्री 108 विशुद्ध सागर जी महाराज के 37वें वर्षायोग (चातुर्मास) का मंगल कलश स्थापना समारोह हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति में सम्पन्न हुआ। गुरुदेव ने चातुर्मास को संयम, साधना और अहिंसा की उपासना का पावन अवसर बताया। पढ़िए श्रीफल साथी राजेश जैन दद्दू की यह रिपोर्ट।


इंदौर/दिल्ली। सकल दिगंबर जैन समाज दिल्ली-एनसीआर के तत्वावधान में ऋषभ विहार, दिल्ली में श्रमण संस्कृति के महामहिम पट्टाचार्य श्री 108 विशुद्ध सागर जी महाराज के 37वें वर्षायोग (चातुर्मास) का मंगल कलश स्थापना समारोह देश के विभिन्न राज्यों से आए हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति में श्रद्धा एवं भक्ति के साथ सम्पन्न हुआ।

चातुर्मास आत्मशुद्धि और अहिंसा का पर्व

अपने मंगल प्रवचन में पट्टाचार्य श्री ने कहा कि चातुर्मास संयम, साधना और आत्मशुद्धि का आत्मिक अनुष्ठान है, जिसका मूल उद्देश्य अहिंसा की उपासना है। अहिंसा ही परम धर्म है और उसकी आराधना से साधक भगवान बनने की दिशा में अग्रसर होता है। उन्होंने कहा कि चातुर्मास धन-संग्रह, बाहरी व्यवस्थाओं या राजनीति का नहीं, बल्कि धर्म साधना और आत्मसिद्धि का काल है।

श्रावक और श्रमण के मिलन का पावन अवसर

पट्टाचार्य श्री ने कहा कि चातुर्मास श्रावक और श्रमण के आध्यात्मिक मिलन का पर्व है। इस अवधि में श्रावकों को संतों के सान्निध्य में धर्मसाधना, जिनवाणी श्रवण और आत्मकल्याण का दुर्लभ अवसर प्राप्त होता है। उन्होंने बताया कि प्राचीन काल में मुनिराज वन में वृक्षों के नीचे वर्षावास करते थे, जबकि वर्तमान समय में साधकों की परिस्थितियों के अनुसार भवनों में रहकर साधना की जाती है।

मंगल कलश स्थापना की परंपरा

समारोह में बताया गया कि वर्ष 1973 में समाधिस्थ आचार्य श्री विमल सागर जी महाराज के चातुर्मास से मंगल कलश स्थापना की परंपरा प्रारम्भ हुई। कलश मंगल, श्रद्धा और धर्म साधना का प्रतीक माना जाता है, जबकि मुनिराज शास्त्रोक्त विधि से भक्तिपाठ कर चातुर्मास की स्थापना करते हैं।

देशभर के संत एवं गणमान्य रहे उपस्थित

समारोह में आचार्य श्री प्रज्ञ सागर जी महाराज, श्रवणबेलगोला के भट्टारक स्वामी चारुकीर्ति जी, अखिल भारतीय शास्त्री परिषद के अध्यक्ष पंडित श्रेयांश जैन बड़ौत सहित अनेक जैन तीर्थों के अध्यक्ष, जनप्रतिनिधि एवं समाजसेवी उपस्थित रहे। प्रथम मुख्य कलश का सौभाग्य दिल्ली के शैलेश, धर्मेंद्र एवं पिंटू जैन परिवार को तथा द्वितीय मुख्य कलश इंदौर के स्व. हेमचंद जैन की स्मृति में श्रीमती मीना जैन, स्वतंत्र जैन एवं भरत जैन परिवार को प्राप्त हुआ। कार्यक्रम का संचालन विजेंद्र जैन एवं पंडित कमल कुमार कमलांकुर ने किया।

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