आगामी 25 अप्रैल को जैन धर्म के पांचवें तीर्थंकर भगवान सुमतिनाथ जी का पावन तप कल्याणक है। पंचांग के अनुसार यह शुभ दिन प्रतिवर्ष वैशाख महीने की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को आता है। दिगंबर जैन समाज में इस दिन का विशेष आध्यात्मिक महत्व है। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष शृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल का यह संकलित-संयोजित आलेख…
इंदौर। आगामी 25 अप्रैल को जैन धर्म के पांचवें तीर्थंकर भगवान सुमतिनाथ जी का पावन तप कल्याणक है। पंचांग के अनुसार यह शुभ दिन प्रतिवर्ष वैशाख महीने की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को आता है। दिगंबर जैन समाज में इस दिन का विशेष आध्यात्मिक महत्व है। इस अवसर पर देशभर के दिगंबर जैन मंदिरों में श्रद्धा, भक्ति और उल्लास का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। भगवान के तप कल्याणक को चिरस्थायी बनाने और उनके प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करने के लिए मंदिरों में विशेष अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं। प्रातःकाल से ही भगवान की मनोहारी प्रतिमा का संगीतमय अभिषेक और विश्व-शांतिधारा की जाती है। इसके पश्चात जल, चंदन, अक्षत, पुष्प, नैवेद्य, दीप, धूप और फल-इन अष्टद्रव्यों से भगवान की विशेष पूजा-अर्चना होती है। समाज के श्रद्धालु भगवान की नित्य नियम पूजन के साथ-साथ विविध विधानादि संपन्न कर अपने कर्मों की निर्जरा का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
तप कल्याणक की रोचक कथा: राजमहल से तपोवन की ओर
तीर्थंकर भगवान का जीवन जन्म से ही चमत्कारों और पुण्यों से भरा होता है, लेकिन उनका तप कल्याणक हमें त्याग की सबसे बड़ी सीख देता है। भगवान सुमतिनाथ जी का जन्म अयोध्या नगरी में महाराजा मेघरथ और माता मंगलावती के यहां हुआ था। युवावस्था में उन्होंने राजपाट संभाला और न्यायपूर्वक प्रजा का पालन किया। कथाओं के अनुसार एक दिन जब वे अपनी राजसभा में विराजमान थे तभी उन्होंने अपने अवधिज्ञान (अथवा जातिस्मरण ज्ञान) से संसार की नश्वरता और क्षणभंगुरता का गहराई से अनुभव किया। उन्हें यह बोध हुआ कि यह राजसी वैभव, धन-संपत्ति और शारीरिक सुख सभी अस्थायी हैं। आत्मा का सच्चा सुख इन भौतिक वस्तुओं में नहीं, बल्कि वीतरागता में है। इसी वैराग्य भाव के साथ उन्होंने उसी क्षण राजपाट का त्याग कर दिया। वैशाख शुक्ल नवमी के शुभ दिन, भगवान सुमतिनाथ ने लौकिक वस्त्रों और आभूषणों का त्याग कर सहेतुक वन (या सहेतुक उद्यान) में जाकर दिगंबर जैनेश्वरी दीक्षा धारण की। उन्होंने केशलोंच किया और मौन धारण कर कठोर तपस्या में लीन हो गए। यही वह महान दिन है, जिसे हम तप कल्याणक के रूप में मनाते हैं।
भगवान सुमतिनाथ के दिव्य संदेश और सीख
भगवान का नाम ‘सुमति’ है, जिसका अर्थ है-सच्ची और श्रेष्ठ बुद्धि। उनका तप कल्याणक हमें जीवन को सार्थक बनाने के लिए कई दिव्य संदेश देता है।
सच्ची सुमति (सम्यक् ज्ञान)- भौतिक ज्ञान आजीविका के लिए हो सकता है, लेकिन सच्ची ‘सुमति’ वही है, जो हमें आत्मा और परमात्मा का भेद समझाए। भगवान का जीवन हमें सम्यक् दर्शन और सम्यक् ज्ञान की ओर प्रेरित करता है।
मोह का त्याग- चाहे कितनी भी बड़ी सत्ता क्यों न हो, एक दिन उसे छोड़ना ही पड़ता है। भगवान ने राजपाट त्याग कर सिखाया कि वस्तुओं से नहीं, बल्कि वस्तुओं के प्रति ‘मोह’ से दुःख उत्पन्न होता है।
तप की महत्ता- बिना तपस्या के कर्मों की निर्जरा संभव नहीं है। जीवन में संयम और अनुशासन ही वह तप है,जो हमें मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करता है।
जैन धर्म को अक्षुण्ण रखने की हिदायतें और हमारा कर्तव्य
आज के इस आधुनिक और भौतिकवादी युग में भगवान सुमतिनाथ जी का तप कल्याणक जैन समाज और युवा पीढ़ी के लिए एक कड़ा संदेश भी लेकर आता है। जैन धर्म के मूल सिद्धांतों को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए हमें इन बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
संस्कारों का संरक्षण- नई पीढ़ी को केवल भौतिक शिक्षा ही नहीं, बल्कि धार्मिक और नैतिक संस्कार भी दें। उन्हें मंदिरों से जोड़ें और जैन धर्म के गौरवशाली इतिहास से अवगत कराएं।
स्वाध्याय और आगम का पठन- भगवान की वाणी जिनवाणी में समाहित है। प्रतिदिन स्वाध्याय करने की आदत डालें ताकि धर्म का सच्चा स्वरूप विकृत न होने पाए।
अहिंसा और अपरिग्रह का पालन- अपनी आवश्यकताओं को सीमित रखें (अपरिग्रह) और मन, वचन तथा कर्म से किसी जीव को कष्ट न पहुंचाएं (अहिंसा)। यही जैन धर्म का मूल आधार है।
वीतरागता का सम्मान- दिगंबर मुनिराजों और संतों का आदर-सत्कार करें तथा उनके बताए मार्ग पर चलने का प्रयास करें।
तप कल्याणक का सार यह है कि…
25 अप्रैल (वैशाख शुक्ल नवमी) का यह तप कल्याणक केवल एक उत्सव नहीं है, बल्कि आत्म-मंथन का दिन है। आइए, इस पावन अवसर पर हम दिगंबर जैन मंदिरों में जाकर भगवान सुमतिनाथ जी के चरणों में अष्टद्रव्य अर्पित करें और यह संकल्प लें कि हम उनके बताए ‘सुमति’ और ‘संयम’ के मार्ग पर चलकर अपने जीवन को सार्थक बनाएंगे। जय जिनेंद्र!













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